Barabanki News: बाराबंकी पुलिस द्वारा जारी कैरेक्टर सर्टिफिकेट में आवेदक के खिलाफ 6139/2021 अपराध संख्या का कथित मुकदमा दर्ज दिखाया गया है।
जबकि न्यायालय और UPCOP के रिकॉर्ड में इस अपराध संख्या का कोई केस मौजूद नहीं है।
पूरे मामले ने बाराबंकी पुलिस की सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 13 जुलाई 2026
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी किया जाने वाला कैरेक्टर सर्टिफिकेट किसी भी नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। सरकारी नौकरी, निजी कंपनी, सुरक्षा एजेंसियों, विदेश यात्रा और कई अन्य संस्थानों में यह प्रमाण पत्र व्यक्ति की छवि और आपराधिक पृष्ठभूमि का आधिकारिक प्रमाण माना जाता है। लेकिन यदि इसी दस्तावेज में ऐसा मुकदमा दर्ज कर दिया जाए, जो पुलिस रिकॉर्ड और न्यायालय दोनों में मौजूद ही न हो, तो सवाल केवल एक व्यक्ति के भविष्य का नहीं बल्कि पूरी सरकारी सत्यापन व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है।
ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सामने आया है, जहां मसौली थाना क्षेत्र के रहने वाले एक युवक को जारी किए गए कैरेक्टर सर्टिफिकेट में ऐसा आपराधिक मुकदमा दर्ज दिखा दिया गया, जिसका रिकॉर्ड न न्यायालय में मिला और न ही यूपी पुलिस के आधिकारिक पोर्टल UPCOP पर।
इस पूरे मामले ने मसौली थाना पुलिस, लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (LIU), डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (DCRB) और पुलिस सत्यापन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रियाज अहमद ने नौकरी के लिए कराया आवेदन
मसौली थाना क्षेत्र के त्रिलोकपुर निवासी रियाज अहमद पुत्र आजम अली ने बताया कि शिक्षक की नौकरी के आवेदन के लिए उन्हें कैरेक्टर सर्टिफिकेट की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने 18 जून 2026 को ऑनलाइन आवेदन किया।
कुछ दिनों बाद मसौली थाने से फोन आया और उन्हें फोटो व अन्य आवश्यक दस्तावेज लेकर थाने बुलाया गया।
रियाज का आरोप है कि थाने में मौजूद कर्मचारी ने दस्तावेज लेने के साथ-साथ “खर्चा-पानी” भी मांगा, जिसे उन्होंने मजबूरी में दे दिया ताकि उनका सत्यापन समय से हो सके।
उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों बाद सामान्य प्रक्रिया के तहत कैरेक्टर सर्टिफिकेट मिल जाएगा, लेकिन जो दस्तावेज उनके हाथ में आया उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी।
2011 के मुकदमे में अदालत पहले ही कर चुकी है दोषमुक्त
रियाज बताते हैं कि वर्ष 2011 में एक पारिवारिक विवाद के चलते उनके खिलाफ मुकदमा संख्या 139/2011 धारा 143, 448, 504, 506 आईपीसी एवं 7 सीएलए एक्ट के तहत दर्ज हुआ था।
इस मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया था।
उन्होंने बताया कि न्यायालय का आदेश मसौली थाने में जमा किया जा चुका है। इतना ही नहीं, इसी रिकॉर्ड के आधार पर उनका पासपोर्ट भी जारी हो चुका है।
रियाज का कहना है कि इस मुकदमे के अलावा उनके खिलाफ आज तक कोई दूसरा आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ।
लेकिन कैरेक्टर सर्टिफिकेट में दर्ज मिला दूसरा मुकदमा
दिनांक 27 जून 2026 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय, बाराबंकी से जारी कैरेक्टर सर्टिफिकेट संख्या 316292643519 में वर्ष 2011 के मुकदमे के साथ-साथ वर्ष 2021 के एक और मुकदमें का विवरण दर्ज मिला।
यह मुकदमा था—
- एफआईआर संख्या-6139/2021
सर्टिफिकेट में इस मुकदमे की स्थिति “न्यायालय में विचाराधीन” दर्शायी गई थी।
यानी सरकारी दस्तावेज के अनुसार रियाज के खिलाफ एक और गंभीर आपराधिक मुकदमा अदालत में लंबित बताया गया।

पुलिस ने कहा—चार्जशीट कोर्ट में है
जब रियाज इस संबंध में मसौली थाने पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ चार्जशीट न्यायालय भेजी जा चुकी है और वहां से जानकारी प्राप्त करें।
इसके बाद रियाज जिला एवं सत्र न्यायालय बाराबंकी पहुंचे।
लेकिन न्यायालय में जब उन्होंने मुकदमा अपराध संख्या 6139/2021 के बारे में जानकारी ली तो इस अपराध संख्या से संबंधित कोई रिकॉर्ड वहां मौजूद ही नहीं मिला।
यानी जिस मुकदमे को पुलिस अपने आधिकारिक कैरेक्टर सर्टिफिकेट में “विचाराधीन” बता रही है, उसका रिकॉर्ड न्यायालय में उपलब्ध ही नहीं है।
UPCOP के रिकॉर्ड ने बढ़ाया रहस्य
मामले की जांच के दौरान एक और बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया।
यूपी पुलिस के आधिकारिक पोर्टल UPCOP पर उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार मसौली थाने में पूरे वर्ष 2021 के दौरान कुल 329 मुकदमे ही दर्ज हुए।
यानी वर्ष 2021 का अंतिम मुकदमा अपराध संख्या 329/2021 था। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार जो वादी अशोक कुमार यादव द्वारा दिनांक 30 दिसंबर 2021 को दर्ज कराया गया था।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है—
- जब पूरे साल में केवल 329 मुकदमे दर्ज हुए, तब 6139/2021 अपराध संख्या का मुकदमा आखिर आया कहां से?
यह प्रश्न पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे गंभीर पहलू बनकर सामने आया है।
तीन एजेंसियों के सत्यापन के बाद जारी हुआ प्रमाण पत्र
कैरेक्टर सर्टिफिकेट पर स्पष्ट लिखा है कि सत्यापन निम्न एजेंसियों द्वारा किया गया—
- संबंधित थाना (मसौली)
- लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (LIU)
- डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (DCRB)
इसके बाद पुलिस अधीक्षक कार्यालय से प्रमाण पत्र जारी किया गया।
ऐसे में प्रश्न यह है कि—
- यदि तीन स्तरों पर सत्यापन हुआ, तो फिर ऐसा कथित मुकदमा सरकारी दस्तावेज तक कैसे पहुंच गया?
गलत रिकॉर्ड से नौकरी पर संकट
रियाज का कहना है कि जिस नौकरी के लिए वो आवेदन करने वाले थे, वहां कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना अनिवार्य था।
अब इस प्रमाण पत्र में “विचाराधीन मुकदमा” दर्ज होने के कारण उनका चयन प्रभावित हो सकता है।
वे पिछले कई दिनों से पुलिस कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अभी तक रिकॉर्ड में संशोधन नहीं हुआ।
क्या यह केवल टाइपिंग मिस्टेक है या गंभीर लापरवाही?
यह मामला केवल एक टाइपिंग गलती तक सीमित नहीं माना जा सकता।
क्योंकि—
- मुकदमा नंबर दर्ज हुआ।
- वर्ष दर्ज हुआ।
- धाराएं दर्ज हुई।
- पुलिस स्टेशन दर्ज हुआ।
- एफआईआर स्टेटस दर्ज हुआ।
- कोर्ट स्टेटस भी दर्ज हुआ।
यानी कई कॉलम में एक साथ जानकारी भरने के बाद प्रमाण पत्र जारी किया गया।
ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर यह डेटा आया कहां से?
पुलिस सत्यापन प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न
यदि किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ ऐसा मुकदमा दर्ज कर दिया जाए जो वास्तविकता में मौजूद ही न हो, तो उसका असर केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा।
ऐसी स्थिति में—
- सरकारी नौकरी रुक सकती है।
- निजी कंपनी नियुक्ति रोक सकती है।
- विदेश जाने में समस्या हो सकती है।
- व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।
यही कारण है कि इस मामले को सामान्य त्रुटि नहीं बल्कि सरकारी सत्यापन प्रणाली की गंभीर खामी के रूप में देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: जवाबदेही तय होना जरूरी
बाराबंकी पुलिस द्वारा जारी इस कैरेक्टर सर्टिफिकेट ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जब न्यायालय में मुकदमा नहीं मिला, UPCOP के रिकॉर्ड में उसका अस्तित्व नहीं मिला और फिर भी सरकारी दस्तावेज में उसे विचाराधीन बताया गया, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
- यदि यह तकनीकी त्रुटि है तो जिम्मेदार कौन?
- यदि रिकॉर्ड में हेरफेर हुआ है तो जवाबदेही किसकी होगी?
और यदि तीन-तीन एजेंसियों के सत्यापन के बाद भी ऐसी गलती संभव है, तो प्रदेश भर में जारी किए जा रहे हजारों कैरेक्टर सर्टिफिकेट की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
ऐसे मामलों में केवल प्रमाण पत्र संशोधित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी जरूरी है कि जांच कर यह तय किया जाए कि आखिर एक गैर-मौजूद मुकदमा सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा कैसे बना।
रिपोर्ट – कामरान अल्वी












