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फर्जी आधार, नकली किसान और 30 लाख का नगद भुगतान… फिर कैसे हुई असली रजिस्ट्री? बाराबंकी पुलिस के खुलासे पर उठे बड़े सवाल

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बाराबंकी के डेरेराजा गांव में 45 लाख रुपये के कथित फर्जी बैनामा कांड में पुलिस के खुलासे पर गंभीर सवाल उठे हैं।

आधार Authentication, बायोमेट्रिक सत्यापन, 30 लाख नकद भुगतान और रजिस्ट्री कार्यालय की भूमिका को लेकर कई बड़े प्रश्न सामने आए हैं।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 12 जुलाई 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के सिरौली गौसपुर तहसील क्षेत्र स्थित डेरेराजा गांव में 13 बीघा कृषि भूमि के कथित फर्जी बैनामा और 45 लाख रुपये की धोखाधड़ी का मामला अब नया मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। एक ओर बदोसराय पुलिस ने छह आरोपियों की गिरफ्तारी कर मामले के खुलासे का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की पूरी कहानी में कई ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।

खास बात यह है कि यह पूरा मामला उस समय सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने फर्जी बैनामों पर रोक लगाने के लिए 1 अप्रैल 2026 से आधार आधारित प्रमाणीकरण (Aadhaar Authentication) और बायोमेट्रिक सत्यापन को अनिवार्य कर रखा है।

किसान ने कहा- मैंने जमीन बेची ही नहीं, फिर कैसे हो गया बैनामा?

मामला सिरौली गौसपुर तहसील क्षेत्र के डेरेराजा गांव का है। गांव निवासी किसान बंशीलाल यादव पुत्र संतराम ने 29 जून 2026 को एसडीएम सिरौली गौसपुर को शिकायती पत्र देकर आरोप लगाया कि उनकी लगभग 13 बीघा कृषि भूमि का फर्जी तरीके से विक्रय पत्र तैयार कर 7 मई 2026 को उप निबंधक कार्यालय सिरौली गौसपुर में पंजीकृत करा दिया गया।

पीड़ित किसान का कहना है कि उन्होंने अपनी जमीन किसी को नहीं बेची और न ही किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके बावजूद उनकी जानकारी के बिना ही उनकी जमीन का बैनामा करा दिया गया।

फर्जी आधार कार्ड बनाकर खड़ा कर दिया नकली बंशीलाल

शिकायत के अनुसार कृष्णावती पत्नी स्व. रामहरख, निवासी ग्राम चंदवारा, तहसील नवाबगंज के नाम यह कथित फर्जी बैनामा कराया गया।

आरोप है कि जालसाजों ने असली बंशीलाल यादव की जगह किसी अन्य व्यक्ति को प्रस्तुत किया। उसके नाम पर फर्जी आधार कार्ड, फोटो और अन्य कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए और इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उप निबंधक कार्यालय में रजिस्ट्री करा ली गई।

कई लोगों पर मिलीभगत का आरोप

पीड़ित किसान ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि पूरे प्रकरण में कई लोगों की भूमिका रही।

शिकायत के अनुसार कृष्णावती के साथ गवाह के रूप में प्रमोद कुमार मिश्रा निवासी चंदवारा, सुशील कुमार निवासी रानी कटरा मजरा अगानपुर, विनोद कुमार वर्मा निवासी खेदरापुर थाना सफदरगंज तथा सुनील कुमार निवासी जंगलापुर मजरा सैदनपुर थाना सफदरगंज शामिल रहे। किसान का आरोप है कि सभी ने आपसी मिलीभगत से अधिवक्ता के माध्यम से कूटरचित विक्रय पत्र तैयार कराया और फर्जी व्यक्ति को प्रस्तुत कर रजिस्ट्री करवा दी।

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एसडीएम ने जांच पुलिस को सौंपी

मामले की जानकारी लेने पर एसडीएम सिरौली गौसपुर ने बताया था कि शिकायत प्राप्त होने के बाद मामले को जांच एवं कार्रवाई के लिए पुलिस को भेज दिया गया था।

पुलिस ने 6 आरोपियों की गिरफ्तारी कर किया खुलासा

इस मामले में नया मोड़ तब आया जब 11 जुलाई 2026 को पुलिस अधीक्षक अर्पित विजयवर्गीय ने प्रेस वार्ता कर बताया कि 9 जुलाई 2026 को कृष्णावती की तहरीर पर बदोसराय थाने में मुकदमा दर्ज किया गया।

पुलिस के अनुसार कृष्णावती ने 45 लाख रुपये में जमीन खरीदी थी, जिसमें 15 लाख रुपये आरटीजीएस तथा 30 लाख रुपये नकद दिए गए थे। बाद में पता चला कि असली बंशीलाल की जगह फर्जी व्यक्ति को खड़ा कर रजिस्ट्री करा दी गई।

पुलिस ने इस मामले में छह आरोपियों को गिरफ्तार कर घटना में प्रयुक्त स्विफ्ट कार भी बरामद करने का दावा किया।

पुलिस की कहानी में आखिर इतने सवाल क्यों?

पुलिस द्वारा पेश की गई कहानी पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल—उप निबंधक कार्यालय के कर्मचारियों की भूमिका पर पुलिस क्यों खामोश?

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि जब उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से प्रदेश के सभी उप निबंधक कार्यालयों में फर्जी बैनामों पर रोक लगाने के लिए OTP आधारित आधार सत्यापन (Aadhaar Authentication) और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अनिवार्य कर दिया है, तब आखिर इतनी बड़ी कथित जालसाजी संभव कैसे हुई?

नियमों के अनुसार विक्रेता का आधार सत्यापन, मोबाइल नंबर पर भेजे गए OTP और बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट मिलान के बाद ही रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी होती है। ऐसे में यदि पुलिस के अनुसार जालसाजों ने किसी अन्य व्यक्ति को असली बंशीलाल बनाकर प्रस्तुत किया, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—

  • आधार प्रमाणीकरण कैसे सफल हुआ?
  • बायोमेट्रिक सत्यापन किस प्रकार पूरा हुआ?
  • असली और फर्जी व्यक्ति के पहचान संबंधी अंतर को किस स्तर पर नजरअंदाज किया गया?
  • रजिस्ट्री के दौरान निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं?

इन सवालों का जवाब पुलिस की जांच में अभी तक सामने नहीं आया है।

असली किसान और गिरफ्तार आरोपी के पिता का नाम तक अलग

मामले में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है।

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असल किसान का नाम है—

  • बंशीलाल यादव पुत्र संतराम निवासी ग्राम डेरेराजा, तहसील सिरौली गौसपुर, जनपद बाराबंकी।

जबकि पुलिस द्वारा गिरफ्तार कथित फर्जी किसान का नाम है—

  • बंशी पुत्र स्वर्गीय मैकूलाल निवासी ग्राम राजपुर थाना पढुआ, जनपद लखीमपुर खीरी।

ऐसे में प्रश्न उठ रहा है कि जब पिता का नाम, पता और पहचान पूरी तरह अलग थी, तब बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के दौरान यह विसंगति कैसे नजरअंदाज हो गई?

30 लाख रुपये नकद भुगतान भी बना बड़ा सवाल

पुलिस के अनुसार जमीन के बदले 15 लाख रुपये बहराइच निवासी राजकुमार पुत्र बिन्द्रा प्रसाद के खाते में आरटीजीएस तथा 30 लाख रुपये नकद दिए गए। खतौनी पर बंशीलाल यादव का नाम दर्ज होने के बावजूद क्रेता द्वारा अन्य व्यक्ति के खाते में 15 लाख की रकम किस आधार पर ट्रांसफर की गई, इसका भी कोई उल्लेख पुलिस ने नहीं किया।।

आयकर अधिनियम की धारा 269ST के तहत एक ही लेनदेन में ₹2 लाख या उससे अधिक का नकद भुगतान प्रतिबंधित है। उल्लंघन होने पर नकद प्राप्त करने वाले पर पूरी राशि के बराबर जुर्माना लगाया जा सकता है। यही कारण है कि 30 लाख रुपये नकद भुगतान का दावा भी कई कानूनी सवाल खड़े कर रहा है, जिनके जवाब अभी भी अनुत्तरित है।

पीड़ित किसान की शिकायत दरकिनार, आरोपी खरीदार की तहरीर पर मुकदमा 

इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह भी है कि पीड़ित किसान 29 जून 2026 को ही एसडीएम से शिकायत के बाद न्याय के लिए दर-दर भटक रहा था, लेकिन पुलिस ने मुकदमा 9 जुलाई 2026 को कथित खरीदार कृष्णावती की तहरीर पर दर्ज किया।

इसके बाद महज दो दिनों में पूरे मामले का खुलासा भी कर दिया गया।

यही वजह है कि पुलिस की जांच और कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।

पुलिस ने छह आरोपियों को जेल भेजा, लेकिन रजिस्ट्री प्रक्रिया से नहीं उठाया पर्दा

बदोसराय पुलिस ने छह आरोपियों की गिरफ्तारी कर मामले के खुलासे का दावा किया है, लेकिन पूरे प्रकरण में उप निबंधक कार्यालय की कार्यप्रणाली और वहां तैनात कर्मचारियों की संभावित भूमिका पर पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में यह जरूर बताया गया कि फर्जी व्यक्ति को जमीन मालिक बनाकर रजिस्ट्री कराई गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि रजिस्ट्री के दौरान आधार सत्यापन, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और दस्तावेजों की जांच किस प्रकार पूरी हुई। यही कारण है कि अब पुलिस की जांच पर भी सवाल उठने लगे हैं।

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क्या फर्जी बैनामे रोकने की सरकारी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित?

उत्तर प्रदेश सरकार ने फर्जी बैनामों पर रोक लगाने के उद्देश्य से आधार आधारित सत्यापन और बायोमेट्रिक प्रणाली लागू की थी, ताकि किसी भी व्यक्ति की पहचान फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बदलकर जमीन की रजिस्ट्री न कराई जा सके।

यदि इस मामले में वास्तव में पुलिस के दावे के अनुसार फर्जी व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री हुई है, तो यह केवल जालसाजों की चालाकी का मामला नहीं बल्कि पूरी सत्यापन प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़ा करता है।

निष्कर्ष: सिर्फ जालसाजों की गिरफ्तारी नहीं, पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच जरूरी

इस मामले में छह आरोपियों की गिरफ्तारी निश्चित रूप से पुलिस की कार्रवाई का हिस्सा है, लेकिन कई महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। विशेष रूप से उप निबंधक कार्यालय में आधार प्रमाणीकरण, बायोमेट्रिक सत्यापन और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई, इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

यदि जांच केवल जालसाजों तक सीमित रहती है और रजिस्ट्री प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं या संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच नहीं होती, तो फर्जी बैनामों पर रोक लगाने के लिए लागू की गई पूरी सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कहीं भी प्रक्रिया में लापरवाही, मिलीभगत या नियमों की अनदेखी हुई है और उसकी निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो सरकार द्वारा फर्जी बैनामों को रोकने के लिए लागू की गई आधार आधारित प्रमाणीकरण व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसलिए इस पूरे प्रकरण में केवल आरोपियों की गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि रजिस्ट्री की संपूर्ण प्रक्रिया की गहन और निष्पक्ष जांच भी उतनी ही आवश्यक है।

रिपोर्ट – कामरान अल्वी 

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Author: Kamran Alvi

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