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Barabanki: 15 साल से ‘हाथीपांव’ की पीड़ा, फिर न झुका हौसला: मोहम्मद अफजाल बने संघर्ष, हिम्मत और खुद्दारी की मिसाल; पढ़ें संघर्ष और खुद्दारी की मार्मिक कहानी।

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Barabanki: पीरबटावन मोहल्ले में रहने वाले मोहम्मद अफ़ज़ाल पिछले 15 वर्षों से फाइलेरिया (हाथीपांव) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं।

दर्द और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और छोटी किराने की दुकान से परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।

पढ़ें उनकी संघर्ष और खुद्दारी की मार्मिक कहानी।

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 28 फरवरी 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के नगर कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत पीरबटावन मोहल्ले के रहने वाले मोहम्मद अफ़ज़ाल की ज़िंदगी आज संघर्ष और खुद्दारी की मिसाल बन चुकी है। बीते करीब 15 सालों से वह फाइलेरिया (हाथीपांव) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन हालात के आगे झुकना उन्होंने कभी नहीं सीखा।

उनकी कहानी सिर्फ बीमारी की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और हौसले की भी कहानी है।

 

क्या है फाइलेरिया (हाथीपांव) और कैसे बनती है जिंदगी दुश्वार?

फाइलेरिया एक परजीवी संक्रमण से होने वाली बीमारी है, जो मच्छरों के काटने से फैलती है। इस बीमारी में शरीर के अंग, विशेषकर पैर, असामान्य रूप से सूज जाते हैं। सूजन इतनी अधिक हो जाती है कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है।

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स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर दवा वितरण अभियान चलाता है, लेकिन एक बार बीमारी गंभीर रूप ले ली तो मरीज को आजीवन शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है।

दर्द के साथ रोजी-रोटी की जंग

मोहम्मद अफ़ज़ाल के पैर में अत्यधिक सूजन है। कई बार चलना भी उनके लिए चुनौती बन जाता है। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानों

वह अपने घर के पास ही एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं। उसी दुकान से अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी है।

Barabanki: 15 साल से ‘हाथीपांव’ की पीड़ा, फिर न झुका हौसला: मोहम्मद अफजाल बने संघर्ष, हिम्मत और खुद्दारी की मिसाल; पढ़ें संघर्ष और खुद्दारी की मार्मिक कहानी।

अफ़ज़ाल रोजाना दर्द सहते हुए अपनी मोपेड से दुकान तक पहुंचते हैं और दिनभर बैठकर ग्राहकों को सामान देते हैं। यही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

 

 

“हाथ नहीं फैलाऊंगा” — खुद्दारी बनी सबसे बड़ी ताकत

अफ़ज़ाल बताते हैं कि उन्होंने सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाया, लेकिन उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला। बड़े अस्पतालों में इलाज कराने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं है।

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उनका कहना है—

“मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि बड़े अस्पताल में इलाज करा सकूं, लेकिन मैं किसी के सामने हाथ भी नहीं फैला सकता।”

बीमारी और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कभी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। यही खुद्दारी उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

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प्रशासन और जप्रतिनिधियों से उम्मीद

अफ़ज़ाल की हालत देखकर स्थानीय लोग और समाजसेवी भी भावुक हो जाते हैं। यह एक ऐसी हकीकत है जो समाज और जनप्रतिनिधियों से संवेदनशीलता की मांग करती है।

जरूरत है कि प्रशासन और संबंधित विभाग आगे आकर उनके बेहतर इलाज और आर्थिक सहायता की व्यवस्था करें, ताकि उन्हें इस असहनीय दर्द से राहत मिल सके।

यह सिर्फ दर्द नहीं, हौसले की कहानी है

मोहम्मद अफ़ज़ाल की कहानी हमें यह सिखाती है कि इंसान हालात से नहीं, अपने हौसलों से बड़ा होता है। 15 साल से बीमारी की मार झेलते हुए भी उन्होंने मेहनत और आत्मसम्मान का दामन नहीं छोड़ा।

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बाराबंकी की यह मार्मिक कहानी समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है—क्या हम ऐसे संघर्षरत लोगों के साथ खड़े होने को तैयार हैं?

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद / उस्मान

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Author: Kamran Alvi

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