Barabanki News: बाराबंकी की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने वर्ष 2020 के मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया।
पीड़िता के बयान पलटने और झूठे साक्ष्य पर अदालत ने वादी के खिलाफ कार्रवाई तथा सरकारी आर्थिक सहायता की 6% ब्याज सहित रिकवरी के आदेश दिए।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 24 जुलाई 2026
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने वर्ष 2020 के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान वादी द्वारा कथित रूप से मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने और पीड़िता द्वारा न्यायालय में घटना से साफ इनकार किए जाने को गंभीर मानते हुए न केवल आरोपियों को दोषमुक्त किया, बल्कि वादी के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई के निर्देश जारी किए। साथ ही पीड़िता को सरकार की ओर से दी गई आर्थिक सहायता की 6 प्रतिशत ब्याज सहित रिकवरी कराने का आदेश भी दिया गया।
यह फैसला न्यायालय संख्या-45 के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट श्री कृष्ण चंद्र सिंह ने सुनाया। अदालत ने मुकुल तिवारी, दिलावर सिद्दीकी और विपिन राठौर को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया।
वर्ष 2020 में दर्ज हुआ था मामला
विशेष लोक अभियोजक लव त्रिपाठी ने बताया कि यह मामला वर्ष 2020 का है। बाराबंकी के कुर्सी थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी पीड़िता के पिता ने पुलिस को तहरीर देकर आरोप लगाया था कि उनकी लगभग 15 वर्षीय पुत्री गांव के बाहर कंडे उठाने गई थी। उसी दौरान गांव निवासी मुकुल पुत्र राजकुमार पंडित वहां पहुंचा और कथित तौर पर दस रुपये का नोट फेंककर उसमें अपना मोबाइल नंबर होने की बात कही।
तहरीर के अनुसार जब किशोरी ने नोट उठाने से इनकार किया और वहां से जाने लगी, तो आरोपी ने उसका हाथ पकड़कर कथित रूप से छेड़छाड़ की। किसी तरह वह अपने घर पहुंची और पूरी घटना अपने परिजनों को बताई। इसके बाद जब परिजन आरोपी से शिकायत करने पहुंचे तो कथित रूप से आरोपियों ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए गाली-गलौज की, मारपीट पर आमादा हुए और जान से मारने की धमकी दी।
पीड़िता के पिता की शिकायत पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर विवेचना शुरू की थी। जांच के बाद आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया और मामला विशेष पॉक्सो कोर्ट में विचाराधीन रहा।
सुनवाई के दौरान पलट गए वादी और पीड़िता के बयान
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वादी मुकदमा और स्वयं पीड़िता दोनों ने न्यायालय में घटना से ही इनकार कर दिया।
न्यायालय के समक्ष दिए गए बयानों में पीड़िता ने कथित घटना का समर्थन नहीं किया, जबकि वादी भी अपने पहले दिए गए आरोपों से पीछे हट गया। इससे अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर पड़ गया।
विशेष लोक अभियोजक लव त्रिपाठी ने न्यायालय के समक्ष उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं पर विस्तार से बहस की। अदालत ने सभी तथ्यों, गवाहों और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा।
अदालत ने तीनों आरोपियों को किया बरी
सभी साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद विशेष पॉक्सो कोर्ट ने मुकुल तिवारी, दिलावर सिद्दीकी और विपिन राठौर को सभी आरोपों से दोषमुक्त घोषित कर दिया।
अदालत ने कहा कि जब पीड़िता स्वयं घटना से इनकार कर रही है और वादी के बयान भी आरोपों का समर्थन नहीं करते, तब अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं किए जा सकते।
झूठे साक्ष्य पर वादी के खिलाफ कार्रवाई के आदेश
इस मामले में अदालत ने केवल आरोपियों को बरी करने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि वादी की भूमिका को भी गंभीरता से लिया।
न्यायालय ने पाया कि मुकदमे के दौरान प्रस्तुत तथ्यों और न्यायालय में दिए गए बयानों के बीच गंभीर विरोधाभास है। इसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने वादी के विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत करने के आरोप में प्रकीर्ण वाद (Miscellaneous Proceedings) दर्ज करने के आदेश दिए हैं।
सरकार की आर्थिक सहायता होगी वापस, डीएम को रिकवरी के निर्देश
विशेष पॉक्सो कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि इस मामले में पीड़िता को सरकार की ओर से जो आर्थिक सहायता प्रदान की गई थी, उसकी 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वसूली की जाएगी।
रिकवरी की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए अदालत ने जिलाधिकारी बाराबंकी को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी जारी किए हैं।
फैसले के बाद चर्चा में आया मामला
विशेष पॉक्सो कोर्ट के इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। न्यायालय का यह आदेश उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें सुनवाई के दौरान गवाह या पीड़ित अपने पहले दिए गए बयानों से पलट जाते हैं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने वालों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि यदि कोई व्यक्ति न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास करता है, तो उसके खिलाफ भी विधिक कार्रवाई की जा सकती है।
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद











