Barabanki News: 20 साल पुराने रिश्वतखोरी मामले में अयोध्या एंटी करप्शन कोर्ट ने बाराबंकी के तत्कालीन दरोगा सुरेन्द्र पाल को बरी कर दिया।
शिकायतकर्ता के बयान से पलटने पर अदालत ने उसी के खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज करने का आदेश दिया।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 25 जुलाई 2026
करीब दो दशक पुराने रिश्वतखोरी के चर्चित मामले में अयोध्या की एंटी करप्शन कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। वर्ष 2006 में बाराबंकी के सतरिख थाने में तैनात दरोगा सुरेन्द्र पाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगा था और उन्हें भ्रष्टाचार निवारण संगठन (Anti Corruption Organization) ने कथित रूप से रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। लेकिन लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान शिकायतकर्ता (वादी) अपने ही बयान से पलट गया, जिसके चलते अदालत ने दरोगा को दोषमुक्त कर दिया। वहीं, अदालत ने झूठे और विरोधाभासी बयान देने के मामले में वादी के खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज कर नोटिस जारी करने का आदेश भी दिया है।
20 साल पुराने घूसखोरी मामले में आया फैसला
अयोध्या स्थित विशेष न्यायाधीश (एंटी करप्शन कोर्ट) रजत वर्मा ने बाराबंकी जिले के सतरिख थाना क्षेत्र के नरौली निवासी अमर बहादुर सिंह द्वारा दर्ज कराए गए रिश्वतखोरी के मुकदमे का निस्तारण करते हुए तत्कालीन दरोगा सुरेन्द्र पाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
यह मामला वर्ष 2006 का है, जब शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके पिता को जमीन विवाद के मामले में जेल भेजने की धमकी देकर दरोगा ने 3,000 रुपये रिश्वत की मांग की थी।
एंटी करप्शन टीम ने 9 सितंबर 2006 को किया था गिरफ्तार
शिकायत के बाद भ्रष्टाचार निवारण संगठन ने जाल बिछाकर कार्रवाई की थी। आरोप था कि 9 सितंबर 2006 को दरोगा सुरेन्द्र पाल को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हुआ और मामला अदालत में विचाराधीन रहा।
अदालत में बयान से पलटा वादी, बदल गया पूरा मामला
विचारण के दौरान मामला उस समय पूरी तरह बदल गया, जब शिकायतकर्ता अमर बहादुर सिंह अदालत में अपने पहले दिए गए बयान से मुकर गया।
वादी ने कोर्ट में यह स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि—
- दरोगा ने उसके पिता से रिश्वत मांगी थी।
- जमीन विवाद में जेल भेजने की धमकी दी गई थी।
- उसके सामने दरोगा की गिरफ्तारी हुई थी।
वादी के इस बदले हुए बयान के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, जिसके बाद अदालत ने आरोपी दरोगा को दोषमुक्त कर दिया।
झूठे और विरोधाभासी बयान पर वादी के खिलाफ होगी कार्रवाई
अदालत ने अपने फैसले में यह भी माना कि वादी ने न्यायालय के समक्ष अपने पूर्व आरोपों के विपरीत बयान दिया है।
इस पर विशेष न्यायाधीश ने वादी अमर बहादुर सिंह के विरुद्ध प्रकीर्ण वाद (Miscellaneous Proceedings) दर्ज करने और नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। अदालत अब यह जांच करेगी कि क्या वादी ने न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या झूठा साक्ष्य देने का प्रयास किया।
न्याय में देरी बनी बड़ा सवाल
यह मामला एक बार फिर भारतीय न्याय व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि पर सवाल खड़े करता है। वर्ष 2006 में दर्ज हुआ मुकदमा करीब 20 वर्ष बाद अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक मुकदमे लंबित रहने के कारण गवाहों के बयान बदल जाते हैं, साक्ष्य कमजोर पड़ जाते हैं और कई मामलों में अभियोजन का पूरा आधार ही समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी आरोपी लाभ की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद











