Barabanki News: नवाबगंज तहसील में 30 दिन में बनने वाला उत्तराधिकार प्रमाण पत्र 6 महीने तक लंबित रहा।
बाराबंकी एक्सप्रेस में खबर प्रकाशित होने के अगले ही दिन प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया।
तहसील की कार्यप्रणाली पर फिर उठे सवाल।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 23 जुलाई 2026
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती हो, लेकिन राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले की नवाबगंज तहसील की कार्यप्रणाली इन दावों पर लगातार सवाल खड़े कर रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि तहसील में बिना “चढ़ावा” के छोटे से छोटा काम भी समय पर नहीं होता। वहीं राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों पर खनन माफियाओं से सांठगांठ, सरकारी भूमि संबंधी मामलों में लापरवाही और आम नागरिकों के कार्यों को महीनों तक लंबित रखने जैसे गंभीर आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
इसी बीच नवाबगंज तहसील का एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने राजस्व विभाग की कार्यशैली और तय समय-सीमा की वास्तविकता उजागर कर दी। 30 दिनों में जारी होने वाला उत्तराधिकार प्रमाण पत्र छह महीने तक लंबित रहा, लेकिन जब यह मामला ‘बाराबंकी एक्सप्रेस’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया तो अगले ही दिन संबंधित अधिकारियों की सक्रियता देखने को मिली और वर्षों नहीं बल्कि महीनों से अटका प्रमाण पत्र तत्काल जारी कर दिया गया।
पहला आवेदन कानूनगो कार्यालय में ही हो गया ‘गायब’
मामला फतहाबाद मजरा बड़ेल, तहसील नवाबगंज निवासी पंकज गुप्ता पुत्र सीतासरन का है।
पंकज गुप्ता ने अपने दिवंगत पिता के उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए 23 जनवरी 2026 को विधिवत आवेदन किया था। आरोप है कि आवेदन संबंधित कानूनगो कार्यालय तक पहुंचने के बाद ही रहस्यमय ढंग से गायब हो गया और उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जब कई महीनों तक कोई सुनवाई नहीं हुई तो पंकज गुप्ता ने हार नहीं मानी और 16 मई 2026 को दोबारा आवेदन प्रस्तुत किया। लेकिन यह आवेदन भी कानूनगो लक्ष्मीकांत मिश्रा के पास महीनों तक लंबित पड़ा रहा।
30 दिन की समय-सीमा, लेकिन 6 महीने तक नहीं मिला प्रमाण पत्र
बाराबंकी कलेक्ट्रेट परिसर की दीवारों पर राजस्व विभाग की विभिन्न सेवाओं के साथ उनकी निर्धारित समय-सीमा भी लिखी गई है। इनमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र 30 दिनों के भीतर जारी किया जाना चाहिए।
लेकिन इस मामले में सरकारी नियम केवल दीवारों तक सीमित दिखाई दिए। पंकज गुप्ता का कहना है कि करीब छह महीने तक उनका प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया, जिससे उन्हें बैंक, राजस्व एवं अन्य सरकारी कार्यों में लगातार परेशानी उठानी पड़ी।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार तहसील के चक्कर लगाने, अधिकारियों से मिलने और गुहार लगाने के बावजूद उन्हें केवल आश्वासन मिलता रहा, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
‘बाराबंकी एक्सप्रेस’ की खबर बनी जिम्मेदारों की नींद तोड़ने का कारण
पीड़ित की समस्या को देखते हुए ‘बाराबंकी एक्सप्रेस’ ने इस मामले को 13 जुलाई 2026 को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
खबर प्रकाशित होते ही कई महीनों से निष्क्रिय बैठे जिम्मेदार अधिकारी अचानक सक्रिय हो गए। आश्चर्यजनक रूप से जिस उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को जारी करने में छह महीने लग गए, वही प्रमाण पत्र अगले ही दिन 14 जुलाई 2026 को जारी कर दिया गया।
यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि यदि प्रशासन समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाए तो आम नागरिकों को महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ें।

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
यह मामला केवल एक व्यक्ति के उत्तराधिकार प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
- जब निर्धारित समय सीमा 30 दिन है तो प्रमाण पत्र छह महीने तक क्यों लंबित रखा गया?
- पहला आवेदन आखिर कानूनगो कार्यालय से कैसे गायब हो गया?
- यदि समाचार प्रकाशित न होता तो क्या पीड़ित को आज भी प्रमाण पत्र के लिए भटकना पड़ता?
- क्या ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
इन सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
आम जनता को समयबद्ध सेवाएं देना प्रशासन की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जैसे राजस्व संबंधी दस्तावेज आम नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इनमें अनावश्यक देरी से लोगों को आर्थिक, सामाजिक और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
यदि समयबद्ध सेवाओं के सरकारी दावे धरातल पर लागू नहीं होते, तो आम जनता का भरोसा प्रशासनिक व्यवस्था पर कमजोर होना स्वाभाविक है।
रिपोर्ट – मंसूफ़ अहमद











