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बाराबंकी जेल में बदल रही कैदियों की जिंदगी: जुर्म छोड़ खेती से जुड़ रहे बंदी, ऑर्गेनिक सब्जियां उगाकर बन रहे आत्मनिर्भर

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बाराबंकी जिला कारागार में कैदी अब जुर्म की दुनिया छोड़ खेती के जरिए आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

जेल अधीक्षक कुंदन कुमार के निर्देशन में बंदी बर्मी कम्पोस्ट से ऑर्गेनिक सब्जियां उगा रहे हैं और आधुनिक खेती की तकनीक सीख रहे हैं।

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 24 मई 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिला कारागार में बंद कैदियों की जिंदगी अब नई दिशा की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। कभी अपराध की दुनिया में भटके ये कैदी अब खेती को अपना सहारा बनाकर आत्मनिर्भर बनने की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। जेल परिसर के अंदर बंदी बर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) की मदद से मौसमी और ऑर्गेनिक सब्जियों की खेती कर रहे हैं, जिसकी चर्चा अब पूरे जिले में हो रही है।

जेल प्रशासन की इस पहल ने न केवल कैदियों को रोजगारपरक कौशल सिखाया है, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास और समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की नई उम्मीद भी जगाई है।

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जेल अधीक्षक कुंदन कुमार की पहल से बदल रही कैदियों की सोच

जिला कारागार में बंदियों के जीवन को सकारात्मक दिशा देने में जेल अधीक्षक कुंदन कुमार की अहम भूमिका मानी जा रही है। उनके निर्देशन में “निमदस” संस्था के प्रबंध निदेशक एसके वर्मा के सहयोग से कैदियों को आधुनिक और उन्नत खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

जेल अधीक्षक का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य केवल सब्जियां उगाना नहीं, बल्कि बंदियों को आत्मनिर्भर बनाना और जेल से बाहर निकलने के बाद उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना है। उनका मानना है कि यदि बंदी कोई हुनर सीखकर बाहर जाएंगे तो समाज में आसानी से पुनर्वास हो सकेगा।

लौकी से लेकर भिंडी तक, जेल परिसर में उग रहीं ऑर्गेनिक सब्जियां

जेलर राजेंद्र सिंह ने बताया कि जिला कारागार में बंदियों द्वारा कई प्रकार की मौसमी और ऑर्गेनिक सब्जियां तैयार की जा रही हैं। इनमें लौकी, तरोई, लोभिया, करेला, कद्दू, बैंगन, भिंडी, हरा साग और लाल साग जैसी फसलें शामिल हैं।

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उन्होंने बताया कि खेती में बर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे पूरी तरह जैविक सब्जियां तैयार हो रही हैं। बंदियों को आधुनिक खेती की तकनीक, जैविक खाद तैयार करने और फसल प्रबंधन का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

जेल सुधार की दिशा में मिसाल बन रहा बाराबंकी जिला कारागार

बाराबंकी जिला कारागार की यह पहल अब जेल सुधार और बंदियों के पुनर्वास की दिशा में एक मॉडल के रूप में देखी जा रही है। जहां एक ओर बंदियों का समय सकारात्मक कार्यों में लग रहा है, वहीं दूसरी ओर उन्हें ऐसा हुनर भी मिल रहा है जो भविष्य में रोजगार का जरिया बन सकता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर इस तरह की पहल अन्य जेलों में भी शुरू की जाए तो अपराध की दुनिया छोड़ चुके लोगों को समाज में दोबारा सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सकता है।

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“जेल से बाहर जाएं तो हुनर के साथ जाएं” — जेल प्रशासन

जेल प्रशासन का कहना है कि उद्देश्य यह है कि जो भी बंदी जेल से बाहर निकले, वह खाली हाथ न जाए बल्कि कोई न कोई हुनर सीखकर समाज की मुख्यधारा से जुड़े। खेती के जरिए बंदियों में अनुशासन, मेहनत और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित हो रही है, जो उनके भविष्य के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद 

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Author: Kamran Alvi

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