Barabanki News: बाराबंकी के निंदूरा ब्लॉक की आगासंड ग्राम पंचायत में ₹1.20 करोड़ की लागत से बना वृहद गौ संरक्षण केंद्र जलभराव के कारण 5 साल से बंद पड़ा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लोकार्पित इस परियोजना पर अब भ्रष्टाचार और सरकारी धन की बर्बादी के गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 01 अगस्त 2026
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सरकारी धन के इस्तेमाल और विकास कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। विकास खंड निंदूरा की ग्राम पंचायत आगासंड में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्राथमिकता वाली वृहद गौ संरक्षण केंद्र योजना के तहत करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से गौशाला का निर्माण कराया गया, लेकिन निर्माण स्थल के चयन में कथित लापरवाही और अनदेखी के कारण यह गौशाला शुरू होने के कुछ ही समय बाद बंद हो गई।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि गौशाला ऐसी जगह बनाई गई, जहां हर बरसात में भारी जलभराव होता है। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गौ संरक्षण केंद्र वर्षों से बंद पड़ा है और अब खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। मामले ने सरकारी योजनाओं की गुणवत्ता, अधिकारियों की जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था लोकार्पण, दो महीने बाद ही बंद हो गई गौशाला
गौ आश्रय केंद्र परिसर में लगे शिलापट्ट के अनुसार, इस वृहद गौ संरक्षण केंद्र का निर्माण उत्तर प्रदेश सीएलडीएफ (UP CLDF) द्वारा कराया गया था। इसका लोकार्पण 29 सितंबर 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कर-कमलों द्वारा किया गया था।
लोकार्पण कार्यक्रम में तत्कालीन सांसद उपेन्द्र सिंह रावत, तत्कालीन प्रभारी मंत्री दारा सिंह चौहान, तत्कालीन एमएलसी स्वतंत्र देव सिंह, स्थानीय विधायक साकेंद्र प्रताप वर्मा, एमएलसी उमेश द्विवेदी तथा एलएमसी इंजीनियर अवनीश कुमार सिंह सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद रहे।
लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि उद्घाटन के लगभग दो महीने बाद ही बारिश के दौरान पूरा परिसर पानी में डूब गया, जिसके बाद गौशाला का संचालन बंद कर दिया गया और तब से लेकर आज तक इसे दोबारा शुरू नहीं किया जा सका।

बंद गौशाला के गेट पर भी खर्च हुए सरकारी पैसे
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गौशाला बंद होने के बाद भी उस पर सरकारी धन खर्च होता रहा।
गौशाला परिसर में लगे एक अन्य शिलापट्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में मनरेगा योजना के तहत करीब 1 लाख रुपये खर्च कर गौशाला के मुख्य गेट का निर्माण कराया गया, जबकि उस समय तक गौशाला का संचालन पूरी तरह बंद था।
ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब गौशाला उपयोग में ही नहीं थी, तब उस पर लगातार सरकारी धन क्यों खर्च किया गया।

23 जुलाई को डीएम के निरीक्षण में खुली हकीकत
23 जुलाई 2026 को जिलाधिकारी ईशान प्रताप सिंह ने इस बंद पड़े गौ संरक्षण केंद्र का निरीक्षण किया। उनके साथ खंड विकास अधिकारी अमन कुमार वर्मा, जेई सचिन यादव, एडीओ पंचायत अनिल कुमार सिंह तथा ग्राम पंचायत सचिव सुधाकर सिंह भी मौजूद रहे।
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने सवाल किया कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी गौशाला आखिर संचालित क्यों नहीं हो रही है।
इस पर खंड विकास अधिकारी अमन कुमार वर्मा ने बताया कि गौशाला लो-लैंड एरिया में बनी है तथा इसके समीप रेठ नदी बहती है। बरसात के दौरान पूरा गौशाला परिसर पानी से भर जाता है और गौशाला तक जाने वाला खड़ंजा मार्ग भी जलमग्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में गौशाला का संचालन संभव नहीं हो पाता।

ग्राम प्रधान ने भी बताई जलभराव की समस्या
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने वर्तमान ग्राम प्रधान राजकिशोर से भी स्थिति की जानकारी ली।
ग्राम प्रधान ने बताया कि बारिश के मौसम में गौशाला के चारों ओर कई फीट तक पानी भर जाता है, जिससे पूरा परिसर जलमग्न हो जाता है।
इसके बाद जिलाधिकारी ने बाढ़ विभाग के अधिकारियों को मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
पूर्व प्रधान का बड़ा दावा- निर्माण से पहले ही किया था विरोध
वर्तमान ग्राम प्रधान राजकिशोर ने बताया कि गौशाला का निर्माण उनके कार्यकाल से पहले हुआ था।
वहीं तत्कालीन ग्राम प्रधान उत्तम कुमार ने दावा किया कि निर्माण शुरू होने से पहले ही उन्होंने संबंधित अधिकारियों को कई बार आगाह किया था कि प्रस्तावित भूमि जलभराव वाले क्षेत्र में है और यहां गौशाला बनाना उचित नहीं होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया और निर्माण कार्य जारी रखा, जिसका परिणाम आज सबके सामने है।
स्थानीय लोगों ने लगाए कमीशनखोरी के आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने निर्माण स्थल का सही सर्वेक्षण किए बिना ही लो-लैंड एरिया में गौशाला बनवा दी और ग्राम प्रधान से लेकर स्थानीय भाजपा विधायक तक उदासीन बने रहे।
उनका कहना है कि यदि निर्माण से पहले वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया होता तो करोड़ों रुपये की यह परियोजना आज बंद नहीं पड़ी होती।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का पूरा फोकस लूट खसोट पर रहा जिसके नतीजे में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई गौशाला आज गौ वंशीय पशुओं के संरक्षण केंद्र के बजाय जलभराव और झाड़ियों का केंद्र बन चुकी है।

अब उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं—
- जब क्षेत्र जलभराव वाला था तो वहीं गौ संरक्षण केंद्र का निर्माण क्यों कराया गया?
- क्या निर्माण से पहले तकनीकी सर्वेक्षण किया गया था?
- ग्राम प्रधान की आपत्तियों को नजरअंदाज क्यों किया गया?
- करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या नहीं?
- गौशाला बंद होने के बाद भी उस पर सरकारी धन खर्च करने की अनुमति किसने दी?
- क्या इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो करोड़ों रुपये की इस परियोजना में हुई कथित लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
जांच के बाद सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
जिलाधिकारी के निरीक्षण के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि पूरे मामले की तकनीकी और प्रशासनिक जांच कराई जाएगी। यदि जांच में निर्माण स्थल के चयन या कार्य में लापरवाही की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है।
फिलहाल करोड़ों रुपये की लागत से बना यह गौ संरक्षण केंद्र बंद पड़ा है और सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद / ललित राजवंशी












