Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आयुष मलिक को स्वतंत्र करते हुए कहा कि बालिग व्यक्ति अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म और अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सकता है।

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | 16 सितम्बर 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 31 वर्षीय आयुष मलिक से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निस्तारण करते हुए उन्हें स्वतंत्र कर दिया। अदालत के समक्ष आयुष मलिक ने कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है और इस फैसले में किसी तरह का दबाव, धमकी, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि वह चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध रखना चाहते हैं।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने की। कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति सामान्यतः अपनी अंतरात्मा के अनुसार अपने धर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। परिवार के सदस्यों को किसी निर्णय का स्वीकार्य न होना, अपने आप में, उस वयस्क की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने का आधार नहीं हो सकता।
दोस्त ने दाखिल की थी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
आयुष मलिक के दोस्त की ओर से हाई कोर्ट में Habeas Corpus Petition दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि आयुष को उनके पिता देवराज सिंह मलिक द्वारा कथित तौर पर उनकी इच्छा के विरुद्ध रोका गया है और इस मामले में राज्य के अधिकारियों की भूमिका भी बताई गई थी।
9 सितम्बर को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आयुष को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया था। उस समय अदालत ने कथित अवैध हिरासत और राज्य अधिकारियों की कथित भूमिका से जुड़े आरोपों को गंभीर प्रकृति का माना था।
यह भी पढ़ें : Barabanki: जमीन की रंजिश में फिर हुआ मौत का तांडव! तमंचे से गोली मारने के बाद कार से रौंदा, लहूलुहान किसान की लखनऊ ले जाते समय मौत
कोर्ट में पेश हुए आयुष मलिक, जस्टिस संदीप जैन ने की बातचीत
16 सितम्बर को आयुष मलिक को अदालत के समक्ष पेश किया गया। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने उनसे सीधे बातचीत की और उनकी इच्छा तथा परिस्थितियों को समझा।
आयुष ने अदालत को बताया कि उनकी उम्र करीब 31 वर्ष है और उन्होंने B.Pharma की पढ़ाई की है। उन्होंने कहा कि उन्होंने वर्ष 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था और यह फैसला बिना किसी दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन के लिया था।
परिवार को पसंद नहीं था धर्म परिवर्तन का फैसला
आयुष ने अदालत को बताया कि उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को उनका इस्लाम अपनाना स्वीकार नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि वह अपनी इच्छा से इस्लाम के धार्मिक आचरण का पालन कर रहे हैं।
उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने धर्म को अपनी इच्छा के अनुसार मानना और उसका पालन करना चाहते हैं।
यह भी पढ़ें: Barabanki: जमीन विवाद में आतंक का नंगा नाच! दबंगों ने महिला समेत 4 को ट्रैक्टर से कुचला, एक की मौत; पुलिस की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
चांदनी कुरैशी से वैवाहिक संबंध की इच्छा भी जताई
आयुष मलिक ने अदालत को बताया कि वह चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध रखना चाहते हैं। उनके अनुसार यह निर्णय भी उनके माता-पिता को स्वीकार नहीं था।
आयुष ने आरोप लगाया कि इसके बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा और उन्हें कथित तौर पर अवैध रूप से घर में नजरबंद रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि 4 जून 2026 से उन्हें घर में रखा गया था।
आयुष ने कहा- कोर्ट के सामने भी किसी दबाव में नहीं
आयुष ने अदालत के समक्ष कहा कि वह किसी दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या दबाव में नहीं हैं और उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपने धर्म और जीवन से जुड़े फैसले लिए हैं।
अदालत ने उनकी व्यक्तिगत बातचीत और बयान को मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं में माना।
पिता ने आरोपों से किया इनकार, कहा- बेटे को प्रभावित किया गया
दूसरी ओर, आयुष के पिता देवराज सिंह मलिक ने अपने बेटे की ओर से लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि आयुष को प्रभावित या कथित रूप से “ब्रेनवॉश” किया गया है और उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम नहीं अपनाया।
पिता ने यह भी कहा कि उन्हें अपने बेटे के भविष्य और कल्याण की चिंता है। इसी वजह से वह आयुष के इस्लाम अपनाने और चांदनी कुरैशी के साथ शादी करने के फैसले से सहमत नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने कहा- बालिग व्यक्ति को अपने धर्म का चुनाव करने की स्वतंत्रता
अदालत ने आयुष की उम्र और उनके बयान को ध्यान में रखते हुए कहा कि वह बालिग हैं और अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने में सक्षम हैं।
कोर्ट ने कहा कि एक वयस्क व्यक्ति सामान्यतः अपनी अंतरात्मा के अनुसार अपने धर्म को चुनने और उसका पालन करने के लिए स्वतंत्र है। केवल परिवार के सदस्यों को उसका फैसला पसंद नहीं होने के कारण उस फैसले को हटाया नहीं जा सकता।
कोर्ट को आयुष के बयान पर अविश्वास का आधार नहीं मिला
हाई कोर्ट ने कहा कि आयुष ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से बताया कि उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया और उनके फैसले के पीछे किसी तरह की धमकी, दबाव, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन नहीं था।
अदालत ने रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री नहीं पाई, जिसके आधार पर कोर्ट को उनके द्वारा अदालत के समक्ष दिए गए बयान पर अविश्वास करने का आधार मिले।
जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा
अदालत ने धर्म के साथ-साथ जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति किसके साथ विवाह करना चाहता है या किसके साथ संबंध स्थापित करना चाहता है, यह उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का विषय है।
अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा कि परिवार की इच्छा या अपेक्षा से अलग होने मात्र के आधार पर किसी वयस्क की पसंद को सीमित नहीं किया जा सकता।
परिवार की असहमति अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बालिग व्यक्ति के धर्म या जीवनसाथी को लेकर परिवार की असहमति अपने आप में उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाने का वैध आधार नहीं बनती।
हालांकि अदालत ने पिता की अपने बेटे के कल्याण को लेकर चिंता को समझने योग्य माना, लेकिन कहा कि ऐसी चिंता किसी सक्षम वयस्क के संवैधानिक रूप से संरक्षित निर्णय लेने के अधिकार को अपने आप खत्म नहीं कर सकती।
कोर्ट ने आयुष मलिक को किया स्वतंत्र
मामले में आयुष के व्यक्तिगत बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक जारी रखने का कोई वैध आधार नहीं पाया।
इसके बाद अदालत ने उन्हें स्वतंत्र कर दिया और कहा कि वह अपनी इच्छा के अनुसार रह सकते हैं तथा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का निर्णय ले सकते हैं। उन्हें अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका पालन करने तथा वैवाहिक संबंध के संबंध में कानून के अनुसार उचित निर्णय लेने की स्वतंत्रता होगी।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण
हाई कोर्ट ने इसी के साथ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया। अदालत का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहा कि बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म के चुनाव और जीवनसाथी के चयन को केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट – नौमान माजिद













