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पहले होर्डिंग से गायब की फ़ोटो, फिर ‘मातहत’ कहकर भड़काई आग, 19 सालों तक बड़बोले कांग्रेस नेता नईम सिद्दीकी की मोहब्बत से क्यों महरूम रहे बाराबंकी सदर के युवा मतदाता?

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बाराबंकी में ईद-उल-अजहा की शुभकामना होर्डिंग को लेकर कांग्रेस नेता नईम सिद्दीकी चर्चा में हैं।

होर्डिंग से जिलाध्यक्ष की तस्वीर गायब करने के बाद उन्हें मातहत बताकर सिद्रादीकी ने जिले की राजनीति में मचाई हलचल।

2002, 2007 और 2022 के चुनावी आंकड़ों के साथ 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बाराबंकी की बदलती राजनीतिक तस्वीर।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 02 जून 2026

ईद उल अज़हा (बकरीद) के मौके पर बाराबंकी जिले के सदर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस नेता और दो बार के पूर्व प्रत्याशी नईम सिद्दीकी द्वारा लगाई गई शुभकामना होर्डिंग को लेकर गहरा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। होर्डिंग में राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रदेश अध्यक्ष सहित राष्ट्रीय नेतृत्व की तस्वीरें स्पष्ट रूप से मौजूद हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष मोहम्मद मोहसिन की फोटो नदारद है। इस omission से सोशल मीडिया पर तेज़ बहस छिड़ गई।

कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने और पार्टी में गुटबाज़ी के आरोप लग ही रहे थे कि तभी नईम सिद्दीकी ने एक यूट्यूब चैनल पर अपने इंटरव्यू के दौरान कांग्रेस जिलाध्यक्ष को मातहत कहकर इस विवाद को और गहरा दिया। स्थानीय लोग कहते हैं कि एक तरफ राहुल गांधी देशभर में लोगों को जोड़ने का काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सिद्दीकी पार्टी में गुटबाज़ी कर कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष बढ़ा रहे हैं और तीन सालों से कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने में जुटे जिलाध्यक्ष मोहम्मद मोहसिन की गरिमा को ठेस पहुंचाने के साथ-साथ इंडिया अलायंस की भी जड़े खोदने का काम कर रहे हैं।

होर्डिंग विवाद और सोशल मीडिया पर बहस

सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल रहे पोस्ट्स और स्थानीय चर्चाओं में यह आरोप लगाया जा रहा है कि सिद्दीकी, जो बिल्डर और फिल्म उद्योग से जुड़े व्यवसायी भी हैं, अपने धनबल के घमंड में जिला अध्यक्ष के पद की गरिमा का अपमान कर रहे हैं और पार्टी की गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाराबंकी में जिला अध्यक्ष की ही फोटो को होर्डिंग से गायब किया जा रहा है, उन्हें सार्वजनिक रूप से मातहत बताया जा रहा है, जो पार्टी अनुशासन के खिलाफ है।

यह पहली बार नहीं है जब सिद्दीकी ने पार्टी की नीतियों और गाइडलाइंस का विरोध किया हो। इससे पहले 2024 में भी बाराबंकी में INDIA अलायंस के कैंडिडेट तनुज पुनिया के जीतने पर लगवाई बधाई संदेश की होर्डिंग में वो जीत में अहम भूमिका निभाने वाले सपा नेताओं की फ़ोटो गायब कर चुके हैं।

दलबदल का आरोप और 2006 का महत्वपूर्ण मोड़ — बसपा से टिकट कटने पर कांग्रेस में शामिल होना

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण और विवादित तथ्य यह है कि नईम सिद्दीकी, जो दूसरों को दलबदलू कहकर कटाक्ष करते रहते हैं, खुद 2002 में BSP प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े थे लेकिन 2006 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) से टिकट कटने पर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। 2007 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने उनका टिकट काटकर संग्राम सिंह वर्मा पर दांव लगा दिया था। टिकट कटते ही सिद्दीकी ने बसपा छोड़कर कांग्रेस में प्रवेश किया और सदर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे। इस कदम ने स्थानीय राजनीति में नई उलझन पैदा की और आम मतदाताओं के बीच उनकी छवि अवसरवादी और सीजनल नेता की बनकर उभरी। नतीजा यह रहा कि 2002 के मुकाबले 2007 में उन्हें मिलने वाले वोट प्रतिशत में काफी गिरावट देखी गई।

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चुनावी इतिहास और वोट आंकड़े (2002 और 2007) — विस्तृत तथ्य

वर्तमान समय में नईम सिद्दीकी लगातार मुस्लिम मतदाताओं को यह एहसास दिलाने में जुटे हैं कि 2002 और 2007 के चुनाव में मुस्लिमों ने उन्हें अपेक्षाकृत कम वोट दिए। लेकिन स्थानीय लोग और राजनीतिक विश्लेषक इसे गलत बताते हैं और 2002 और 2007 के चुनावी आंकड़ों को संदर्भ मानकर सिद्दीकी की राजनीतिक छवि पर सवाल उठाते हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया और मुस्लिम वोटों के बिखराव ने चुनावों के नतीजों में कितनी बड़ी भूमिका निभाई:

2002 विधानसभा चुनाव (सदर विधानसभा):

  • समाजवादी पार्टी (सपा) प्रत्याशी छोटेलाल यादव: 44,874 वोट (विजेता)
  • भारतीय जनता पार्टी (BJP) प्रत्याशी संग्राम सिंह वर्मा: 44,847 वोट (उपविजेता)
  • बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रत्याशी नईम सिद्दीकी: 41,171 वोट
  • कांग्रेस प्रत्याशी संतोष: 4,446 वोट

मुस्लिम वोटों के बिखराव के कारण सपा प्रत्याशी छोटेलाल यादव चुनाव हारते हारते बचे और केवल 27 वोटों से अपनी सीट बचा सके। यह मामूली अंतर स्थानीय राजनीति में बड़ी गहराई से चर्चा का विषय बना।

2007 विधानसभा चुनाव (सदर विधानसभा):

  • BSP प्रत्याशी संग्राम सिंह वर्मा: 49,030 वोट (विजेता)
  • सपा प्रत्याशी छोटेलाल यादव: 38,365 वोट (उपविजेता)
  • कांग्रेस प्रत्याशी नईम सिद्दीकी: 29,128 वोट

BSP प्रत्याशी संग्राम सिंह वर्मा ने 49,030 वोट पाकर जीत हासिल की, जबकि कई बार के विधायक रह चुके छोटेलाल यादव मात्र 38,365 वोट पर सिमट गए और 10,395 मतों के बड़े अंतर से चुनाव हार गए। वही जिस कांग्रेस को 2002 में केवल 4,446 वोट मिले थे; 2007 में उसी कांग्रेस से चुनाव लड़कर सिद्दीकी ने 29,128 वोट हासिल कर लिए। मुस्लिम मतदाताओं के वोटों में सेंधमारी कर भले ही वह खुद विधायक नहीं बन सके, लेकिन सपा प्रत्याशी की हार का अहम फैक्टर जरूर बने।

स्थानीय विश्लेषको का कहना है कि 2007 में सिद्दीकी को 2002 में मिले (41,171 वोट) की तुलना में कम (29,128 वोट) मिलने के दो मुख्य कारण माने गए:

  • पहला, कांग्रेस प्रत्याशी होने के कारण BSP के कैडर वोट न मिलना
  • दूसरा, 2002 में चुनाव हारने के बाद आम जनता से दूरी बनाकर भूमिगत हो जाना।

2022 का विफल प्रयोग पत्नी की लखनऊ पश्चिम से उम्मीदवारी 

2002 और 2007 में खुद विधायक बनने का सपना पूरा नहीं होने पर सिद्दीकी ने अपनी रणनीति बदलते हुए 2022 विधानसभा चुनाव में अपनी पत्नी शहाना सिद्दीकी को लखनऊ पश्चिम विधानसभा सीट से कांग्रेस से टिकट दिलवाया, लेकिन सिद्दीकी की अवसरवादी और सीजनल नेता छवि के चलते वहां के मतदाता उनके फ़रेब में नहीं आए। नतीजा महज 2,796 वोट मिलने के चलते उनकी पत्नी शाहाना सिद्दीकी की जमानत तक जब्त हो गई। राजनीतिक विश्लेषक इसे उनके अवसरवादी राजनीतिक रुख का परिणाम मानते हैं।

विधानसभा की तस्वीर और जनता की तकदीर बदलने के दावे

जनवरी 2026 शुरू होते ही, एक बार फिर सिद्दीकी ने अपनी रणनीति बदली और 19 साल के लंबे अंतराल के बाद बाराबंकी सदर के मतदाताओं की फिक्र एक बार फिर उन्हें दिनों-रात सताने लगी। अप्रैल 2026 तक आते-आते स्थिति यह हो गई कि शहर के किसी इलाके में पानी न आए तो वो बेचैन हो जाते हैं और कहीं किसी मतदाता को छींक या खरोंच तक आ जाए तो उनकी रातों की नींद उड़ जाती है।

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सिद्दीकी बिना नागा रोजाना क्षेत्र में घूमते हैं और सोशल मीडिया के जरिए मतदाताओं को यह एहसास दिलाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं कि आजादी से लेकर आज तक लोगों ने सही जनप्रतिनिधि का चुनाव नहीं किया। नईम सिद्दीकी लगातार यह दावा करते आ रहे हैं कि यदि उन्हें विधायक बनने का मौका दिया गया तो वे बाराबंकी सदर विधानसभा की तस्वीर और यहां के लोगों की तकदीर दोनों ही बदल देंगे।

सपा विधायक के भाजपा में जाने की भविष्यवाणी

एक और विवादित पहलू यह है कि नईम सिद्दीकी लगातार अपने बयानों में सहयोगी दल समाजवादी पार्टी के सिटिंग एमएलए सुरेश यादव के टिकट कटने पर भाजपा में जाने की भविष्यवाणी कर रहे है। सदर सीट सपा के मजबूत किले के रूप में जानी जाती है और सुरेश यादव लगातार तीन बार यहां से जीतते रहे हैं। उनसे पहले भी इस सीट पर ज्यादातर समाजवादियों का ही कब्जा रहा है।

संग्राम सिंह वर्मा के परिवार पर प्रहार और विवादित पोस्ट

खुद दल बदलने के बावजूद नईम सिद्दीकी ने कुर्मी समाज के बड़े नेताओं में शुमार स्वर्गीय संग्राम सिंह वर्मा के परिवार को दलबदलु बताने से गुरेज़ नहीं किया। उनके छोटे भाई की पत्नी और सपा की नगर पालिका परिषद अध्यक्ष शीला सिंह के ख़िलाफ़ भी वो लगातार हमलावर है और मुस्लिम विरोधी बता रहे हैं। सिद्दीकी के इन बयानों ने जहां स्थानीय कुर्मी समाज में नाराजगी पैदा की है वहीं मुस्लिम समुदाय के वोटों की गोलबंदी के नाम पर सपा विधायक के खिलाफ की गई उनकी बयानबाजी पर समाजवादी खेमें से लेकर खुद कांग्रेस पार्टी के लोग भी सवाल उठा रहे हैं।

मुस्लिम वोटों की गोलबंदी और सपा-बसपा गठबंधन पर अलग रुख

मुस्लिम समुदाय के वोटों की गोलबंदी के लिए सिद्दीकी यूपी में अपनी सहयोगी समाजवादी पार्टी, जिससे गठबंधन के चलते ही बाराबंकी लोकसभा सीट पर लगातार हार का रिकॉर्ड बना रहे पूर्व ब्यूरोक्रेट व कांग्रेस नेता पीएल पुनिया के पुत्र और कांग्रेस प्रत्याशी तनुज पुनिया को जीत का स्वाद चखना नसीब हो सका, उसी के तीन बार के विधायक सुरेश यादव के भाजपा में जाने की भविष्यवाणी और आए दिन उनके विकास कार्यों को लेकर सवाल खड़े करने से नहीं गुरेजते।

उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस का गठबंधन होने के बावजूद वो सपा पर लगातार हमलावर रहे हैं और BSP के साथ गठबंधन के हिमायती रहे और इसे लेकर अपनी फेसबुक वाल पर समय-समय पर पोस्ट डालते रहे।

राजनीतिक विश्लेषक: स्वार्थ से ज्यादा पार्टी का भला नहीं

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस हिमायत के पीछे कांग्रेस पार्टी के भले से ज्यादा उनका अपना स्वार्थ शामिल है। क्योंकि वो 2027 के विधानसभा चुनाव में जनपद की मुस्लिम बाहुल्य सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। यदि 2027 के चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबन्धन जारी रहता है तो इस सीट का सपा के कोटे में जाना पूरी तरह से तय है। ऐसे में नईम सिद्दीकी की दाल गलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है।

लेकिन यदि 2027 में कांग्रेस का बसपा के साथ गठबंधन होता है तो लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के चलते सदर सीट कांग्रेस के कोटे में जा सकती है और अपने धनबल और सदर सीट से दो बार प्रत्याशी रहने के नाते वो इस सीट पर टिकट के लिए मजबूत दावेदारी पेश कर सकते हैं।

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राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि अपने स्वार्थ के लिए पार्टी गाइडलाइन्स के खिलाफ काम कर नईम सिद्दीकी न सिर्फ कांग्रेस का अहित कर रहे हैं बल्कि सार्वजनिक रूप से मुस्लिम समुदाय को एकजुट करने से सम्बन्धित पोस्ट और बयानबाजी कर वो हिंदुओं को भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लामबंद कर वो अपनी सहयोगी समाजवादी पार्टी को जड़ों में भी मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं।

स्थानीय प्रतिक्रिया और युवा मतदाताओं का संदेह — 19 साल बाद अचानक उमड़ा प्यार

स्थानीय लोगों का कहना है कि 2007 के बाद पूरे 19 साल तक जिस विधानसभा सीट के मतदाताओं का हाल चाल पूछना तक उन्होंने जरूरी नहीं समझा, जनवरी 2026 शुरू होते ही उन्हीं मतदाताओं की फ़िक्र उन्हें दिनों रात सताने लगी। जिस बाराबंकी सदर विधानसभा के मतदाताओं को वो भुला चुके थे अब 2027 विधानसभा के चुनाव नज़दीक आते-आते एक बार फिर उनके दिल में उन्हीं मतदाताओं के लिए प्यार हिलोरे मारने लगा। लेकिन 2007 विधानसभा चुनाव के पूरे 19 साल बाद उमड़ रहे उनके प्यार को सदर विधानसभा की जनता शक की नजर से देख रही है।

खासकर वो युवा मतदाता जो 2007 के आसपास पैदा हुए फिर बाल्यावस्था से होते हुए किशोरावस्था पार करने तक नईम सिद्दीकी की इस मोहब्बत से महरूम रहे, अब 18 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद जब उनका नाम मतदाता सूची में शामिल हो चुका है उन्हें नईम सिद्दीकी का अचानक उमड़ रहा प्यार और अपने लिए फिक्र हज़म नहीं हो रही; वे इसे स्वार्थ और शक की नजर से ही जोड़ कर देख रहे हैं।

 

विवाद, चुनावी रणनीति और आगामी संभावनाएं

बाराबंकी की राजनीति में नईम सिद्दीकी को लेकर उठ रहे विवाद ने स्थानीय राजनीतिक मंच पर नई उलझनें पैदा कर दी हैं। होर्डिंग से जिलाध्यक्ष की फोटो गायब करना, दलबदल के आरोप, संग्राम सिंह के परिवार पर प्रहार, सुरेश यादव के टिकट कटने पर भाजपा जाने की भविष्यवाणी, और विधानसभा की तस्वीर व जनता की तकदीर बदलने के बड़े दावे — सभी मिलकर एक जटिल राजनीतिक चित्र बनाते हैं। पार्टी के भीतर के तनाव, सोशल मीडिया पर फैलती चर्चाएँ और आगामी 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक अनिश्चितताएँ इस मुद्दे को और बढ़ा सकती हैं।

अब देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी और उसका शीर्ष नेतृत्व इस विवाद का समाधान कैसे करते हैं। देखना यह भी दिलचस्प होगा कि क्या सिद्दीकी 2027 के चुनाव में विधायक बनने का अपना ढाई दशक पुराना सपना पूरा करने में सफल होंगे या 2007 की तर्ज पर मुस्लिम मतदाताओं के वोटो में सेंधमारी कर समाजवादी पार्टी की लुटिया डुबाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

रिपोर्ट – कामरान अल्वी 

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