लखीमपुर में 19 साल पुराने दहेज हत्या मामले में पुलिस की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जब्त किए गए सोने के जेवर बारिश में गल गए और कुछ पोटलियां बंदर उठा ले गए।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए पुलिस की गंभीर लापरवाही पर सवाल उठाए और दोषी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
एक साल बाद भी कार्रवाई न होने पर पीड़ित परिवार हाईकोर्ट जाने की तैयारी में है।

लखीमपुर, उत्तर प्रदेश | 17 जून 2026
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिस की कार्यप्रणाली और मालखानों में जब्त संपत्तियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 19 वर्ष पुराने दहेज हत्या मामले में अदालत द्वारा बरी किए गए आरोपियों को जब जब्त किए गए सोने के जेवर लौटाने का समय आया, तो पुलिस ने कोर्ट में ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया।
पुलिस ने अदालत को बताया कि जब्त किए गए सोने के जेवरों से भरी पोटली बारिश में भीग गई थी। उसे सुखाने के लिए मालखाने की छत पर रखा गया, जहां अधिकांश जेवर खराब हो गए और कुछ पोटलियां बंदर उठा ले गए। अदालत ने इस स्पष्टीकरण को न केवल अस्वीकार कर दिया बल्कि इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
2007 के दहेज हत्या मामले से जुड़ा है पूरा प्रकरण
मामला वर्ष 2007 का है। लखीमपुर शहर के कपूरथला मोहल्ला निवासी मुदित अग्रवाल की पत्नी रानी अग्रवाल उर्फ जूली ने दिवाली की रात कथित रूप से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
मृतका के मायके पक्ष की शिकायत पर दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था। मामले में पति मुदित अग्रवाल सहित अन्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। पोस्टमार्टम के दौरान मृतका के शरीर से उतारे गए सोने के आभूषण पुलिस के सुपुर्द किए गए थे, जिन्हें सदर कोतवाली के मालखाने में जमा कराया गया था।
17 साल बाद आरोपी बरी, फिर जेवरों की मांग
लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 28 फरवरी 2024 को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद मुदित अग्रवाल ने अदालत में आवेदन देकर जब्त किए गए जेवर अपने पक्ष में रिलीज करने की मांग की।
जब अदालत ने पुलिस से इस संबंध में रिपोर्ट मांगी तो पुलिस की ओर से जो जवाब दाखिल किया गया, उसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।
पुलिस का दावा- बारिश में गल गए जेवर, बंदर उठा ले गए पोटलियां
पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार 7 सितंबर 2013 तक की मालखाने में रखी गई पोटलियों को बारिश में भीगने के बाद सुखाने के लिए छत पर रखा गया था।
रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ पोटलियां बंदर उठा ले गए, जबकि बाकी में रखे जेवर बारिश के कारण खराब हो गए। पुलिस के इस स्पष्टीकरण को लेकर अदालत ने कड़ी नाराजगी जाहिर की।
कोर्ट ने कहा- सोना बारिश में नहीं गलता
तत्कालीन सत्र न्यायाधीश लक्ष्मीकांत शुक्ल ने पुलिस की दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि सोने के आभूषण बारिश में नष्ट नहीं हो सकते।
अदालत ने सवाल उठाया कि मालखाने जैसे संवेदनशील स्थान पर रखी गई कीमती संपत्ति को खुले में बिना सुरक्षा और निगरानी के कैसे छोड़ा जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि जब्त जेवरों का उपयोग पुलिसकर्मियों द्वारा अपने हित में किया गया हो सकता है।
दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई और क्षतिपूर्ति के निर्देश
अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने और पीड़ित पक्ष को क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
हालांकि, आरोप है कि अदालत के आदेश के लगभग एक वर्ष बाद भी न तो किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हुई और न ही पीड़ित पक्ष को कोई क्षतिपूर्ति प्रदान की गई।
अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी में पीड़ित परिवार
मामले में कार्रवाई न होने से नाराज पीड़ित परिवार अब उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है। परिवार का कहना है कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इस मामले ने न केवल पुलिस मालखानों में जब्त संपत्तियों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि न्यायिक आदेशों के अनुपालन को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।
पुलिस व्यवस्था और जवाबदेही पर उठे सवाल
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि अदालत में प्रस्तुत तथ्यों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती है तो यह न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिए चिंताजनक स्थिति है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग और सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाते हैं।
रिपोर्ट – नौमान माजिद











