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बाराबंकी के चर्चित माती चौकी कांड में 22 आरोपी दोषी करार: पुलिस चौकी में तोड़फोड़, आगजनी और पुलिसकर्मियों को जिंदा जलाने की हुई थी कोशिश

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बाराबंकी के चर्चित 2015 माटी पुलिस चौकी आगजनी कांड में अदालत ने 22 आरोपियों को दोषी करार दिया है।

पुलिस चौकी में तोड़फोड़, आगजनी और पुलिसकर्मियों को जिंदा जलाने की कोशिश मामले में सजा पर सुनवाई 25 मई को होगी।

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 24 मई 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के बहुचर्चित माती पुलिस चौकी आगजनी और पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले के मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। करीब 11 वर्ष पुराने इस सनसनीखेज मामले में अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-02 राकेश कुमार सिंह प्रथम ने 22 आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोषियों को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजते हुए सजा के बिंदु पर सुनवाई के लिए 25 मई 2026 की तारीख तय की है।

यह मामला वर्ष 2015 में देवा थाना क्षेत्र की माती पुलिस चौकी में हुई हिंसा, आगजनी और पुलिसकर्मियों को जिंदा जलाने की कोशिश से जुड़ा है। उस समय इस घटना ने न केवल बाराबंकी बल्कि पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था। दिनदहाड़े हुई इस हिंसक घटना के बाद पूरे इलाके में कई दिनों तक दहशत और तनाव का माहौल बना रहा था।

हवालात में आत्महत्या की घटना के बाद भड़का था मामला

शासकीय अधिवक्ता अरविंद राजपूत के मुताबिक, इस पूरे मामले की शुरुआत 30 अगस्त 2015 को हुई थी, जब देवा थाने की हवालात में बंद अभियुक्त सुभाष राजवंशी द्वारा आत्महत्या कर ली गई थी। घटना के बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया था। आरोप है कि कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और लोगों को भड़काया गया।

अगले दिन यानी 31 अगस्त 2015 को बड़ी संख्या में लोग माती पुलिस चौकी पहुंच गए। उस समय चौकी पर आरक्षी राजेंद्र सिंह बिष्ट अपने साथी पुलिसकर्मियों प्रदीप सिंह, रणजीत सिंह, पारस नाथ मिश्रा और अशोक यादव के साथ ड्यूटी पर मौजूद थे।

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तहरीर के अनुसार, भीड़ में शामिल लोग लाठी-डंडे, सरिया और डीजल-पेट्रोल से भरी पिपियां लेकर पहुंचे थे। भीड़ ने पुलिस चौकी को चारों तरफ से घेर लिया और नारेबाजी शुरू कर दी।

“पुलिस वालों को जिंदा जला दो”, ललकारते हुए किया गया हमला

मुकदमे में दर्ज तहरीर के मुताबिक, आरोपियों ने पुलिसकर्मियों को जान से मारने की नीयत से हमला बोल दिया। तहरीर में कहा गया कि भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने ललकारते हुए कहा — “चौकी में मौजूद पुलिस वालों को जिंदा जलाकर मार डालो, कोई बचने न पाए।”

इसके बाद उग्र भीड़ ने चौकी में तोड़फोड़ शुरू कर दी। चौकी परिसर में मौजूद सरकारी दस्तावेज, अभिलेख, फर्नीचर और पुलिसकर्मियों के निजी सामान को तोड़ दिया गया। पुलिसकर्मियों के बक्सों को तोड़कर उसमें रखा सामान और नकदी भी नष्ट कर दी गई।

आरोप है कि हमलावरों ने चौकी भवन के सामने बने छप्पर में आग लगा दी, जिसके बाद देखते ही देखते पूरी चौकी आग की लपटों में घिर गई। चौकी परिसर में खड़ी मोटरसाइकिलों को भी आग के हवाले कर दिया गया। आरक्षी पारस मिश्रा और प्रदीप सिंह की मोटरसाइकिलें जलकर राख हो गई थीं।

इसके अलावा आरक्षी अशोक यादव के रिश्तेदार की कार को भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।

वायरलेस सेट तोड़ा, संचार व्यवस्था की ठप

हमले के दौरान आरोपियों ने चौकी का वायरलेस सेट भी तोड़ दिया था, जिससे पुलिस की संचार व्यवस्था पूरी तरह बाधित हो गई थी। पुलिस के अनुसार, यह सब जानबूझकर किया गया ताकि समय रहते अतिरिक्त पुलिस बल मौके पर न पहुंच सके।

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इतना ही नहीं, हमलावरों ने चौकी में बने शस्त्रागार का दरवाजा तोड़कर हथियार लूटने की भी कोशिश की। पुलिसकर्मियों ने जब उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन पर लाठी-डंडों और सरियों से हमला कर दिया गया।

इस हमले में सिपाही प्रदीप सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अन्य पुलिसकर्मियों ने किसी तरह जान बचाकर वहां से भागने में सफलता पाई थी। अगर समय रहते पुलिसकर्मी बाहर न निकलते तो बड़ा हादसा हो सकता था।

दिनदहाड़े हुई घटना से पूरे इलाके में फैल गई थी दहशत

माती पुलिस चौकी पर हुए इस हमले के बाद माती बाजार, देवा क्षेत्र और आसपास के गांवों में अफरा-तफरी मच गई थी। सड़कें सूनी हो गई थीं और व्यापारिक गतिविधियां भी प्रभावित हुई थीं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, उस दिन चौकी से उठती आग की लपटें और धुएं का गुबार कई किलोमीटर दूर तक दिखाई दे रहा था। घटना के बाद पूरे इलाके में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा था।

इस मामले को लेकर प्रदेश स्तर तक हलचल मच गई थी और पुलिस प्रशासन पर भी सवाल खड़े हुए थे कि आखिर इतनी बड़ी भीड़ चौकी तक कैसे पहुंच गई और समय रहते हालात पर नियंत्रण क्यों नहीं किया जा सका।

पुलिस ने 24 लोगों को बनाया था नामजद आरोपी

घटना के बाद थाना देवा में गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस विवेचना के दौरान कुल 24 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था।

इनमें पूर्व प्रधान कन्हैया रावत, कमलेश वर्मा, बिंदु वर्मा, चंद्रिका रावत, कमलेश वर्मा प्रमोद रावत, धर्मेंद्र रावत, दिनबंधु, सर्वेश कुमार वर्मा, अंगद रावत, मंत्री रावत, विनोद, दुर्गेश, राकेश रावत, राजेश, रामू, रंजीत रावत, सोनेलाल, अजय कुमार वर्मा,  विनोद, ओमप्रकाश रावत, बेंदा, देशराज उर्फ पुत्तन, सिराज और कबीर के नाम शामिल थे।

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पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न गंभीर धाराओं में आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था।

लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने सुनाया फैसला

करीब एक दशक तक चले इस चर्चित मुकदमे में अदालत ने वादी मुकदमा, घायल पुलिसकर्मियों, प्रत्यक्षदर्शियों और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने फैसला सुनाया।

सुनवाई के दौरान दो आरोपियों — ओमप्रकाश रावत और दिनबंधु — की मृत्यु हो गई। जबकि शेष 22 आरोपियों को अदालत ने दोषी मानते हुए न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया।

25 मई को तय होगी दोषियों की सजा

अब अदालत 25 मई 2026 को दोषियों की सजा पर सुनवाई करेगी। माना जा रहा है कि पुलिस चौकी में आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सरकारी कार्य में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों की हत्या की कोशिश जैसे गंभीर अपराधों को देखते हुए दोषियों को कड़ी सजा मिल सकती है।

बाराबंकी का माती पुलिस चौकी कांड प्रदेश के चर्चित मामलों में गिना जाता है। अदालत के इस फैसले को कानून व्यवस्था और पुलिस पर हमलों के मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद 

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Author: Kamran Alvi

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