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“पुलिस वालों को जिंदा जला दो” कहकर फूँक दी पुलिस चौकी, 11 साल बाद 22 दोषियों को अदालत ने सुनाई 7-7 साल की सजा

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बाराबंकी के चर्चित माती पुलिस चौकी आगजनी और पुलिसकर्मियों पर हमले के 11 साल बाद अदालत का फैसला आया है।

मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 22 दोषियों को 7-7 साल की सजा सुनाई है।

वर्ष 2015 में हुई इस हिंसक घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था।

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 25 मई 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के बहुचर्चित माती पुलिस चौकी आगजनी और पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले के मामले में करीब 11 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-02 राकेश कुमार सिंह प्रथम की अदालत ने सोमवार को इस मामले में दोषी करार दिए गए सभी 22 आरोपियों को 7-7 साल के कारावास की सजा व सभी को ₹20,500/- जुर्माना भुगतने की सज़ा सुनाई है।

शनिवार को अदालत ने सभी आरोपियों को दोष सिद्ध करार दिया था, जिसके बाद सोमवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया गया। अदालत के इस निर्णय को कानून व्यवस्था और पुलिस पर हमलों के मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।

वर्ष 2015 में माती पुलिस चौकी में हुई थी हिंसा और आगजनी

यह पूरा मामला वर्ष 2015 में देवा थाना क्षेत्र की माती पुलिस चौकी में हुई हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी से जुड़ा है। उस समय इस घटना ने पूरे बाराबंकी समेत प्रदेश की कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था।

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शासकीय अधिवक्ता अरविंद राजपूत के अनुसार, 30 अगस्त 2015 को देवा थाने की हवालात में बंद अभियुक्त सुभाष राजवंशी द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया था। आरोप है कि कुछ लोगों ने इस घटना को राजनीतिक रंग देकर भीड़ को भड़काया।

इसके अगले दिन 31 अगस्त 2015 को भारी संख्या में लोग माती पुलिस चौकी पहुंच गए। उस समय चौकी पर आरक्षी राजेंद्र सिंह बिष्ट अपने साथी पुलिसकर्मियों प्रदीप सिंह, रणजीत सिंह, पारस नाथ मिश्रा और अशोक यादव के साथ ड्यूटी पर मौजूद थे।

“पुलिस वालों को जिंदा जला दो” कहकर किया गया हमला

पुलिस की तहरीर के अनुसार, भीड़ लाठी-डंडे, सरिया और डीजल-पेट्रोल से भरी पिपियां लेकर चौकी पहुंची थी। आरोप है कि भीड़ में शामिल लोगों ने पुलिस चौकी को चारों तरफ से घेर लिया और पुलिसकर्मियों को जिंदा जलाने की मंशा से हमला कर दिया।

हमलावरों ने चौकी परिसर में तोड़फोड़ करते हुए सरकारी दस्तावेज, अभिलेख, वायरलेस सेट और पुलिसकर्मियों के निजी सामान को नुकसान पहुंचाया। चौकी भवन के सामने बने छप्पर में आग लगा दी गई, जिससे पूरी चौकी आग की चपेट में आ गई।

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इस दौरान पुलिसकर्मियों की मोटरसाइकिलें भी जला दी गईं। आरक्षी प्रदीप सिंह इस हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे, जबकि अन्य पुलिसकर्मियों ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई थी।

शस्त्रागार लूटने और संचार व्यवस्था ठप करने की कोशिश

मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत में पेश साक्ष्यों के अनुसार, आरोपियों ने चौकी का वायरलेस सेट तोड़कर पुलिस की संचार व्यवस्था बाधित कर दी थी ताकि समय पर अतिरिक्त पुलिस बल मौके पर न पहुंच सके।

इतना ही नहीं, भीड़ ने चौकी के शस्त्रागार का दरवाजा तोड़कर हथियार लूटने की भी कोशिश की थी। पुलिस के विरोध करने पर उन पर लाठी-डंडों और सरियों से हमला किया गया था।

पुलिस ने 24 लोगों को बनाया था आरोपी

घटना के बाद थाना देवा में गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस विवेचना के दौरान कुल 24 लोगों को नामजद आरोपी बनाया गया था।

सुनवाई के दौरान दो आरोपियों — ओमप्रकाश रावत और दीनबंधु — की मृत्यु हो गई। जबकि शेष 22 आरोपियों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलता रहा।

करीब एक दशक तक चली सुनवाई के दौरान अदालत ने घायल पुलिसकर्मियों, प्रत्यक्षदर्शियों और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए। दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने सभी 22 आरोपियों को दोषी मानते हुए 7-7 साल की सजा सुनाई।

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फैसले को कानून व्यवस्था के लिहाज से अहम माना जा रहा

माती पुलिस चौकी कांड बाराबंकी के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में गिना जाता है। दिनदहाड़े हुई इस हिंसक घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत फैल गई थी और कई दिनों तक तनावपूर्ण माहौल बना रहा था।

अब 11 साल बाद आए अदालत के फैसले को पुलिस और कानून व्यवस्था के दृष्टिकोण से बेहद अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला सरकारी संस्थानों पर हिंसक हमलों के मामलों में एक मजबूत संदेश देने वाला साबित होगा।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद 

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Author: Kamran Alvi

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