Barabanki:
बाराबंकी जिला महिला अस्पताल में 7 माह की गर्भवती महिला को गलत जानकारी देकर निजी अस्पताल भेजने का आरोप। सरकारी डॉक्टरों की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल, सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश।
प्रदेश के डिप्टी सीएम एवं चिकित्सा व परिवार कल्याण विभाग मंत्री बृजेश पाठक के ताबड़तोड़ औचक निरीक्षणों के बावजूद राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं लगातार सवालों के घेरे में है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही नहीं, बल्कि जिला मुख्यालय स्थित पुरुष और महिला अस्पताल में गंभीर बीमारियों तो दूर सामान्य बीमारियों का भी इलाज नहीं मिल पा रहा है, इलाज के बजाय दोनों ही अस्पताल महज़ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं।
सरकारी अस्पतालों में सस्ते इलाज की आस लेकर पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों से न केवल अभद्र व्यवहार किया जा रहा है, बल्कि बिना ठोस कारण निजी अस्पतालों में इलाज कराने का दबाव भी बनाया जा रहा है। ताजा मामला जिला महिला अस्पताल से सामने आया है, जिसने एक बार फिर सरकारी डॉक्टरों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
7 माह की गर्भवती महिला को घंटों किया गया नजरअंदाज
शहर के घोसियाना मोहल्ले के निवासी आफ़ान अहमद अपनी 7 माह की गर्भवती पत्नी अदीबा नूर को 31 दिसंबर 2025 की सुबह करीब 10 बजे अचानक पेट दर्द होने पर जिला महिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। ओपीडी में मौजूद महिला डॉक्टर ने दर्द की बात सुनते ही तत्काल मरीज को इमरजेंसी के भर्ती कराने की सलाह दी, लेकिन इसके बाद करीब एक घंटे तक कोई डॉक्टर या नर्स मरीज की सुध लेने नहीं पहुंची।
पति आफ़ान अहमद के लगातार अनुरोध के बाद किसी तरह मरीज को प्रथम तल पर भर्ती के लिए ले जाया गया, जहां ड्यूटी पर तैनात महिला डॉक्टर अनुराधा ने मरीज से कथित रूप से अभद्र व्यवहार किया। इसके बाद बिना किसी स्पष्ट जांच के गर्भस्थ शिशु की धड़कन न मिलने का हवाला देते हुए और महिला अस्पताल में सुविधाएं न होने की बात कही और किसी “बड़े अस्पताल” में ले जाने की सलाह दे दी।
बिना रेफर पर्ची निजी अस्पताल भेजने का आरोप
डॉक्टर द्वारा बच्चे की धड़कन न मिलने की बात सुनकर पति-पत्नी सदमे में आ गए। जब आफ़ान अहमद ने पूछा कि किस अस्पताल में ले जाना चाहिए तो डॉक्टर ने गोलमाल जवाब देकर टाल दिया, साथ ही कोई लिखित रेफर पर्ची भी नहीं दी गई।
अस्पताल की इस अव्यवस्था और डॉक्टर के ग़ैर-जिम्मेदाराना रवैये से घबराकर आफ़ान अहमद ने परिजनो से सलाह के बाद 31 दिसंबर 2025 को ही पत्नी को शहर के एक निजी नर्सिंग होम में दिखाया, जहां जांच के बाद महिला डॉक्टर ने मां और बच्चा दोनों को पूरी तरह स्वस्थ बताया।

इसे सुनकर एक बार तो पति पत्नी को यकीन ही नहीं हुआ। संतुष्टि के लिए उन्होंने शहर की एक अन्य वरिष्ठ महिला एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ0 अनुपमा टिबडेवाल को भी दिखाया, जिन्होंने भी जांच के बाद जच्चा-बच्चा दोनों को सुरक्षित बताया। लगातार दो निजी डॉक्टरों द्वारा सब कुछ सामान्य बताए जाने के बाद परिवार ने राहत की सांस ली।
चिकित्सा मंत्री को पत्र, सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत
जिला महिला अस्पताल की डॉक्टर द्वारा गलत जानकारी देने से आहत आफ़ान अहमद ने प्रदेश के चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग मंत्री बृजेश पाठक को पत्र लिखकर जिला महिला अस्पताल में चल रहे कथित गोरखधंधे की शिकायत की है। इसके साथ ही उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पूरे मामले की जांच और दोषी डॉक्टर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
सुविधा शुल्क देने पर ही होता है इलाज
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि सरकार भले ही मुफ्त इलाज का दावा करती है, लेकिन महिला और पुरुष दोनों हो सरकारी अस्पतालो में बिना पैसों के कोई काम नहीं होता। यहां ज्यादातर डॉक्टरों के दलाल सेट है जो बेहतर इलाज के नाम पर मरीजों के तीमारदारों से सुविधा शुल्क वसूलते है। इस बात की चर्चा आम है कि इन्हीं दलालों के माध्यम से आने वाले मरीजों को भर्ती कर लिया जाता है बाकी मरीजों को कोई न कोई बहाना बनाकर रेफर कर दिया जाता है।
निजी अस्पतालों के दलालों का भी जमावड़ा
यह कोई पहला मामला नहीं है। सूत्रों की माने तो जिला पुरुष और महिला अस्पताल दोनों में ही निजी अस्पतालो और नर्सिंग होम के दलाल 24 घंटे सक्रिय रहते है। सरकारी अस्पताल में सस्ता इलाज कराने की आस लेकर दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों और तीमारदारों को डॉक्टरों द्वारा मरीज़ की हालत गंभीर बताकर या सुविधाओं की कमी का बहाना बनाकर बड़े अस्पताल में इलाज कराने का फरमान सुना दिया जाता है।।
इसके बाद अस्पताल परिसर में मौजूद दलाल मानसिक रूप से परेशान मरीजों और तीमारदारों को अच्छे इलाज का झांसा देकर अपने सेटिंग वाले निजी अस्पताल में भर्ती करा देते हैं। जिसके बदले उन्हें मोटा मिलता है, जो बाद में मरीज के बिल में जोड़कर उनका गला कांटा जाता है। सूत्र यह भी दावा करते है कि कमीशनखोरी के इस खेल में कुछ सरकारी डॉक्टरों की भूमिका भी संदिग्ध प्रतीत होती है।
अब बड़ा सवाल यह है कि डिप्टी सीएम के निरीक्षणों के बावजूद आखिर बाराबंकी के सरकारी अस्पतालों यह गोरखधंधा कब तक चलता रहेगा, और कब गरीब मरीजों को वास्तव में सस्ता इलाज मिलेगा ?
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद

















