Barabanki News: हैदरगढ़ के पोखरा में राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल बारिश में जलमग्न हो जाता है।
डॉक्टर कक्ष और औषधि कक्ष में गंदा पानी भरने से मरीजों को परेशानी हो रही है।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 15 अगस्त 2026
जब देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है और गांव-गांव तक विकास की तस्वीर बदलने के दावे किए जा रहे हैं, उसी दिन बाराबंकी के हैदरगढ़ तहसील क्षेत्र की पोखरा ग्राम पंचायत से सामने आई तस्वीरें सरकारी व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं।
यहां मरीजों के इलाज के लिए बनाया गया राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल खुद बदहाली का शिकार है। बारिश होते ही अस्पताल परिसर तालाब में तब्दील हो जाता है। हालात इतने खराब हैं कि मरीजों और अस्पताल के कर्मचारियों को घुटनों तक भरे गंदे पानी के बीच से गुजरकर इलाज और दवाओं तक पहुंचना पड़ रहा है।
सबसे गंभीर बात यह है कि जलभराव केवल अस्पताल के बाहर तक सीमित नहीं है। गंदा पानी डॉक्टर के कमरे और औषधि कक्ष तक पहुंच चुका है।
आजादी के जश्न के बीच अस्पताल में ‘जलभराव’
पोखरा ग्राम पंचायत में बने राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल तक पहुंचने के लिए मुख्य मार्ग से कोई पक्का रास्ता नहीं है। बरसात में यह समस्या और विकराल हो जाती है।
बारिश के बाद अस्पताल के आसपास और रास्ते में पानी भर जाता है। इलाज कराने आने वाले मरीजों को इसी पानी से होकर अस्पताल तक पहुंचना पड़ता है।
ग्रामीणों के मुताबिक अस्पताल में प्रतिदिन दो से तीन दर्जन मरीज इलाज के लिए आते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं, जिन्हें जलभराव के बीच से होकर अस्पताल पहुंचना पड़ता है।
डॉक्टर के कमरे और औषधि कक्ष में भी भरा गंदा पानी
अस्पताल की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जलभराव का पानी भवन के अंदर तक पहुंच गया है।
डॉक्टर के कमरे और औषधि कक्ष में गंदा पानी जमा है। डॉक्टर की मेज-कुर्सी और मरीजों के बैठने के स्टूल तक पानी में डूबे हुए नजर आते हैं।
अस्पताल में तैनात डॉक्टर राजेश और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जगन्नाथ किसी तरह दवाइयों को मेजों के ऊपर रखकर पानी से बचाने की कोशिश करते हैं।
यानी जिस जगह मरीजों को स्वच्छ वातावरण में उपचार और दवा मिलनी चाहिए, वहीं गंदे पानी के बीच स्वास्थ्य सेवाएं संचालित करने की मजबूरी बनी हुई है।
न रास्ता बना, न जलनिकासी की व्यवस्था; बारिश में खुल जाती है बदहाली की पोल
ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल भवन के निर्माण के समय ही जलभराव की समस्या को नजरअंदाज किया गया।
बताया गया कि अस्पताल को निचले इलाके में बनाया गया, लेकिन निर्माण से पहले पर्याप्त मिट्टी पटाई और जलनिकासी की व्यवस्था नहीं कराई गई। इसका खामियाजा अब मरीजों और अस्पताल कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर अस्पताल परिसर का लेवल ऊंचा किया जाता और पानी की निकासी के लिए उचित व्यवस्था होती तो हर बारिश में यह स्थिति पैदा नहीं होती।
टुल्लू पंप से पानी निकालते हैं कर्मचारी, बारिश होते ही फिर भर जाता है अस्पताल
जलभराव से निपटने के लिए अस्पताल में कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है।
ग्रामीणों के अनुसार जब बारिश रुकने के बाद पानी थोड़ा कम होता है तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जगन्नाथ टुल्लू पंप के सहारे अस्पताल के कमरों में जमा गंदा पानी बाहर निकालते हैं।
लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने के कारण बारिश होते ही पानी दोबारा अस्पताल में घुस जाता है।
इस तरह अस्पताल में हर बारिश के साथ पानी निकालने और फिर पानी भरने का सिलसिला चलता रहता है।
इलाज कराने आए मरीजों के सामने संक्रमण का खतरा
अस्पताल का उद्देश्य लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन परिसर में गंदा पानी जमा रहने से यहां स्वच्छता और संक्रमण के खतरे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
मरीजों को पहले गंदे पानी से होकर अस्पताल तक पहुंचना पड़ता है और फिर अंदर भी इसी पानी के बीच डॉक्टर से परामर्श लेने की स्थिति बन रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द जलनिकासी और अस्पताल तक पक्के रास्ते की व्यवस्था नहीं की गई तो बारिश के दौरान मरीजों की परेशानी और बढ़ सकती है।
ग्रामीणों का सवाल- आखिर कब मिलेगी जलभराव से मुक्ति?
पोखरा के ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल जैसी जरूरी सरकारी स्वास्थ्य सुविधा को इस तरह की बदहाली में छोड़ना गंभीर मामला है।
ग्रामीण चाहते हैं कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर अस्पताल परिसर की मिट्टी पटाई, जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था और मुख्य मार्ग से अस्पताल तक पक्का रास्ता बनवाए, ताकि मरीजों को बारिश के मौसम में गंदे पानी से होकर इलाज कराने के लिए मजबूर न होना पड़े।
आजादी के 80 साल बाद भी अगर एक सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए मरीजों को घुटनों तक गंदे पानी में उतरना पड़े, तो यह तस्वीर केवल जलभराव की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर विकास और सरकारी व्यवस्थाओं के बीच मौजूद खाई की भी कहानी कहती है।
रिपोर्ट – कामरान अल्वी
























