बाराबंकी की समाजसेविका शाइस्ता अख्तर महिला सशक्तिकरण, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, दिव्यांगजन सहायता और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
14 अगस्त: राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण दिवस पर बाराबंकी एक्सप्रेस विशेष में जानिए उनकी प्रेरक यात्रा।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 14 अगस्त 2026
समाज में बदलाव केवल बड़े पदों और बड़े संसाधनों से नहीं आता, बल्कि संवेदनशील सोच, मजबूत इच्छाशक्ति और लगातार किए जाने वाले छोटे-छोटे प्रयासों से भी परिवर्तन की बड़ी तस्वीर तैयार होती है। शाइस्ता अख्तर ऐसी ही संवेदनशील, कर्मठ और दूरदर्शी समाजसेविका हैं, जिन्होंने अपने जीवन को समाज के कमजोर, वंचित, जरूरतमंद और उपेक्षित वर्गों की सेवा के लिए समर्पित किया है।
लखनऊ से विवाह के बाद बाराबंकी आईं शाइस्ता अख्तर ने अपने ससुर के नाम पर संस्था की स्थापना कर समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका शुरू की। वर्तमान में वे मो. सईद मेमोरियल वेलफेयर सोसायटी की सक्रिय सचिव के रूप में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला स्वावलंबन, दिव्यांगजन सहायता, बाल एवं महिला कल्याण, ग्रामीण विकास और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।
उनकी कार्यशैली की खासियत यह है कि वे समाजसेवा को केवल किसी कार्यक्रम या औपचारिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं मानतीं, बल्कि इसे मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी के रूप में देखती हैं।
समाजसेवा की शुरुआत: संवेदना से संकल्प तक
शाइस्ता अख्तर का समाजसेवा से जुड़ाव किसी अचानक लिए गए फैसले का परिणाम नहीं है। समाज के कमजोर वर्गों, गरीब परिवारों, ग्रामीण महिलाओं और दिव्यांगजनों की समस्याओं को करीब से देखने के बाद उनके भीतर कुछ ठोस करने की इच्छा मजबूत हुई।
उन्होंने महसूस किया कि समाज में बड़ी संख्या में ऐसी महिलाएं हैं, जिनमें प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है, लेकिन आर्थिक संसाधनों, शिक्षा, प्रशिक्षण और अवसरों के अभाव में वे आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं।
विशेषकर ग्रामीण और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में काम करने का उन्होंने संकल्प लिया। धीरे-धीरे यह प्रयास एक मिशन में बदल गया।
उनका उद्देश्य केवल महिलाओं को प्रशिक्षण देना नहीं रहा, बल्कि उन्हें कौशल, आत्मविश्वास, सम्मान और स्वावलंबन के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना रहा।

महिला सशक्तिकरण बनी समाजसेवा की प्रमुख प्राथमिकता
शाइस्ता अख्तर के सामाजिक कार्यों का सबसे प्रमुख पक्ष महिला सशक्तिकरण और महिला स्वावलंबन है।
उन्होंने आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर महिलाओं तक पहुंच बनाने का प्रयास किया और उन्हें रोजगारपरक प्रशिक्षण से जोड़ने की दिशा में काम किया।
महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटीशियन, कंप्यूटर शिक्षा, मशरूम की खेती, मसाला निर्माण, बेकिंग, दीपक निर्माण, अबीर-गुलाल, पापड़ और विभिन्न गृह उद्योगों से जुड़े कौशल का प्रशिक्षण दिया गया।
इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि महिलाओं को ऐसे व्यावहारिक हुनर से जोड़ना रहा, जिनके माध्यम से वे घर से ही छोटे स्तर पर स्वरोजगार शुरू कर सकें।

हुनर को बनाया आत्मनिर्भरता का माध्यम
शाइस्ता अख्तर का मानना है कि किसी महिला को सशक्त बनाने का सबसे प्रभावी तरीका उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना है।
इसी सोच के साथ महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने और उनके हुनर को आय के साधन में बदलने का प्रयास किया गया। इससे महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने और परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान देने की दिशा में मदद मिली।
उनकी पहल ने महिलाओं को यह संदेश दिया कि वे केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं। उनके भीतर मौजूद हुनर और क्षमता उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र पहचान दिला सकती है।

रोजगार से सम्मान तक: स्वरोजगार को बढ़ावा
शाइस्ता अख्तर के लिए महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल अधिकारों की बात करना नहीं है। उनका जोर महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के वास्तविक अवसर उपलब्ध कराने पर रहा है।
सिलाई-कढ़ाई, खाद्य उत्पाद, सजावटी वस्तुएं, घरेलू उत्पाद और अन्य छोटे व्यवसायों से जुड़े प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं को आय अर्जित करने की दिशा में प्रेरित किया गया।
इस प्रयास का मकसद महिलाओं को केवल लाभार्थी बनाना नहीं, बल्कि उन्हें समाज और परिवार के आर्थिक विकास में सक्रिय भागीदार बनाना है।
यही सोच उनके सामाजिक कार्यों को केवल सहायता वितरण से आगे ले जाकर आत्मनिर्भरता और स्थायी सामाजिक परिवर्तन से जोड़ती है।

दिव्यांगजन और जरूरतमंद वर्गों के लिए भी सक्रिय भूमिका
शाइस्ता अख्तर की समाजसेवा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। उन्होंने दिव्यांगजन, गरीब परिवारों, ग्रामीण समुदायों, बुजुर्गों और जरूरतमंद बच्चों के लिए भी काम किया है।
उनकी संस्था के माध्यम से विभिन्न अवसरों पर निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर, दिव्यांगजन परीक्षण एवं सहायता शिविर, सामाजिक जागरूकता अभियान, शिक्षा एवं साक्षरता कार्यक्रम तथा जरूरतमंद परिवारों के सहयोग जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इन गतिविधियों के पीछे उनका उद्देश्य केवल तत्काल सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि जरूरतमंद लोगों को सम्मान, सुविधा और अवसर उपलब्ध कराना रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याण पर जोर
स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से जरूरतमंद परिवारों तक चिकित्सा संबंधी सहायता और जागरूकता पहुंचाने का प्रयास भी उनकी सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा रहा है।
दिव्यांगजनों के लिए आयोजित सहायता एवं परीक्षण शिविरों ने ऐसे परिवारों को सहयोग और भरोसा देने का काम किया, जिन्हें अक्सर संसाधनों और जानकारी के अभाव में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को माना बदलाव की कुंजी
शाइस्ता अख्तर का स्पष्ट मानना है कि किसी भी समाज का वास्तविक विकास शिक्षा और जागरूकता के बिना संभव नहीं है।
इसी सोच के साथ उन्होंने महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण समुदायों के बीच शिक्षा, साक्षरता और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की दिशा में कार्य किया।
उनके प्रयासों में महिलाओं को शिक्षा के महत्व, अपने अधिकारों, स्वास्थ्य, पोषण और आत्मनिर्भरता के प्रति जागरूक करने पर जोर रहा है।
सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता
महिला सुरक्षा, घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और आत्मनिर्भरता जैसे विषयों पर जागरूकता पैदा करने के प्रयास भी उनके सामाजिक कार्यों का हिस्सा रहे हैं।
उनकी सोच है कि जागरूक व्यक्ति न केवल अपने अधिकारों को बेहतर तरीके से समझ सकता है, बल्कि अपने परिवार और समुदाय में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
गृहिणी से समाजसेवा की प्रेरक पहचान तक
शाइस्ता अख्तर की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने गृहिणी की पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी कोई महिला सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आज उनकी पहचान केवल एक संस्था की सचिव के रूप में नहीं, बल्कि महिला स्वावलंबन, सामाजिक जागरूकता और जरूरतमंदों की सहायता के लिए सक्रिय रूप से काम करने वाली समाजसेविका के रूप में बनी है।

सम्मान और उपलब्धियां
शाइस्ता अख्तर के सामाजिक योगदान, महिला सशक्तिकरण के प्रयासों और जनसेवा के प्रति उनकी सक्रियता को विभिन्न मंचों पर सम्मान और पहचान मिली है।
महिलाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण से जोड़ना, स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित करना, दिव्यांगजन कल्याण गतिविधियों में भागीदारी करना और ग्रामीण समुदायों के बीच सामाजिक जागरूकता बढ़ाना उनके प्रमुख कार्यक्षेत्रों में शामिल रहे हैं।
हालांकि किसी समाजसेविका की उपलब्धि केवल पुरस्कारों और सम्मानों से नहीं मापी जा सकती। उनके कार्यों की वास्तविक सफलता उन लोगों के जीवन में दिखाई देती है, जिन्हें उनके प्रयासों से सहायता, अवसर, प्रशिक्षण या आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा मिली।

व्यक्तित्व की खासियत: सादगी, संवेदना और नेतृत्व
शाइस्ता अख्तर के व्यक्तित्व में सेवा, सादगी, संवेदना और नेतृत्व का समन्वय दिखाई देता है।
वे समस्याओं को केवल देखने या उन पर चर्चा करने के बजाय उनके समाधान के लिए आगे बढ़कर काम करने में विश्वास रखती हैं। उनकी कार्यशैली सहयोग और समर्पण पर आधारित है।
महिलाओं को केवल सहायता पाने वाले वर्ग के रूप में देखने के बजाय उन्हें सामाजिक बदलाव की सक्रिय भागीदार बनाना उनकी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भविष्य की दृष्टि: हर जरूरतमंद तक पहुंचे अवसर
शाइस्ता अख्तर की सामाजिक दृष्टि एक ऐसे समाज की है, जहां हर महिला आत्मनिर्भर हो, हर बच्चा शिक्षा से जुड़े, जरूरतमंद व्यक्ति को सम्मान मिले और दिव्यांगजनों को भी समान अवसर उपलब्ध हों।
उनका जोर समाजसेवा को केवल दान या सहानुभूति तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, कौशल, आत्मनिर्भरता, सम्मान और अवसर के माध्यम से स्थायी बदलाव लाने पर है।
वे महिलाओं को उनके हुनर से जोड़ने, युवाओं को सही दिशा देने, जरूरतमंद परिवारों तक सहयोग पहुंचाने और सामाजिक जागरूकता को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम करने की सोच रखती हैं।

निष्कर्ष: कर्म से बनी पहचान
शाइस्ता अख्तर की कहानी समाजसेवा, महिला स्वावलंबन और मानवीय संवेदना की कहानी है।
उन्होंने अपने कार्यों के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि सामाजिक बदलाव के लिए हमेशा बड़े पद या बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। साफ नीयत, मजबूत संकल्प और निरंतर प्रयास भी बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं।
उनकी पहचान उनके पद से अधिक उनके सामाजिक कार्यों और सेवा-भाव से जुड़ी है। महिलाओं को हुनर और रोजगार से जोड़ने से लेकर दिव्यांगजनों, जरूरतमंद परिवारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने तक उनकी यात्रा सामाजिक जिम्मेदारी की एक प्रेरक मिसाल प्रस्तुत करती है।
शाइस्ता अख्तर का जीवन उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखते हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि जब सेवा केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन जाए, तो उसके प्रभाव की पहुंच व्यक्ति से निकलकर पूरे समाज तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद














