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इलाज के नाम पर बाराबंकी के NLPD हॉस्पिटल की खौफनाक लापरवाही: 22 वर्षीय युवती की तड़प-तड़प कर मौत, परिजन बोले – “बेटी चलकर गई थी, अब शव बनकर लौटी”

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बाराबंकी के निजी हॉस्पिटल में तड़प-तड़प कर 22 वर्षीय नेहा यादव की मौत।

परिजनों ने गलत खून चढ़ाने, चिकित्सकीय लापरवाही और समय पर रेफर न करने का आरोप लगाया।

जिले के स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर भी सवाल।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 01 जून 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में एक निजी अस्पताल के इलाज पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नगर कोतवाली क्षेत्र के आलापुर-सफीपुर मार्ग स्थित नंदलाल प्रभु देवी (NLPD) हॉस्पिटल में हालत बिगड़ने के बाद 22 वर्षीय युवती नेहा यादव की सोमवार सुबह हिंद अस्पताल में मौत हो गई। मृतका के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन, इलाज कर रहे डॉक्टर और संचालकों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि गलत खून चढ़ाने और कथित चिकित्सकीय लापरवाही के कारण उनकी बेटी की कई दिन तड़पने के बाद जान चली गई।

परिजनों का आरोप है कि नेहा 22 मई को अपने पैरों पर चलकर अस्पताल पहुंची थी, लेकिन इलाज के दौरान उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। पहले पूरे शरीर में फफोले पड़े, फिर मुंह से खून और बलगम आने लगा और अंततः कई दिनों तक दर्दनाक पीड़ा झेलने के बाद उसने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद परिवार में कोहराम मचा हुआ है और क्षेत्र में अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

बुखार और कमजोरी की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंची थी नेहा

सतरिख थाना क्षेत्र के भारागंज गांव निवासी राजेश कुमार यादव पेशे से ऑटो चालक हैं और मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी 22 वर्षीय बेटी नेहा को 22 मई 2026 को बुखार और अत्यधिक कमजोरी की शिकायत हुई थी। बेहतर इलाज की उम्मीद में वे उसे नगर कोतवाली क्षेत्र के आलापुर स्थित NLPD हॉस्पिटल लेकर पहुंचे।

परिजनों के अनुसार अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टर जगदीश राय ने प्लेटलेट्स और खून की कमी बताते हुए ब्लड चढ़ाने की सलाह दी। आरोप है कि अस्पताल परिसर में संचालित ब्लड बैंक से ₹4500 लेकर एक यूनिट रक्त चढ़ाया गया। परिवार का कहना है कि रक्त चढ़ाने के करीब दो घंटे बाद ही नेहा की हालत अचानक बिगड़ने लगी और उसके शरीर पर फफोले निकल आए।

“रेफर करने के बजाय ठीक होने का भरोसा देते रहे डॉक्टर”

परिवार का आरोप है कि जैसे-जैसे नेहा की स्थिति खराब होती गई, उन्होंने कई बार उसे किसी बड़े अस्पताल में रेफर करने की मांग की। लेकिन इलाज कर रहे डॉक्टर जगदीश राय और अस्पताल संचालक सुशील लगातार यह आश्वासन देते रहे कि मरीज को ठीक कर दिया जाएगा और उसे स्वस्थ अवस्था में घर भेजा जाएगा।

परिजनों का कहना है कि इसी भरोसे में उन्होंने इलाज जारी रखा और करीब 50 हजार रुपये से अधिक खर्च कर दिए। लेकिन स्वास्थ्य में सुधार होने के बजाय नेहा की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। कुछ दिनों बाद उसके मुंह से खून और बलगम आने लगा, जिससे परिवार की चिंता और बढ़ गई।

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मेडिकल रिकॉर्ड मांगने पर विवाद, बड़े अस्पताल ले जाने का दबाव

नेहा की हालत गंभीर होने के बाद परिवार ने इलाज से जुड़े दस्तावेज और मेडिकल रिकॉर्ड मांगे। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने शुरुआत में रिकॉर्ड देने में आनाकानी की और परिजनों के साथ अभद्र व्यवहार किया।

किसी तरह रिकॉर्ड मिलने के बाद परिवार ने लखनऊ के कई वरिष्ठ चिकित्सकों से सलाह ली। परिजनों का दावा है कि वहां उन्हें बताया गया कि मरीज की हालत बेहद गंभीर हो चुकी है और तत्काल उच्च स्तरीय चिकित्सा की आवश्यकता है।

इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों पर मरीज को किसी बड़े अस्पताल में ले जाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।

 

अस्पताल में हुआ हंगामा, पुलिस को करनी पड़ी दखल

परिवार का आरोप है कि 29 मई को जब अस्पताल प्रबंधन ने मरीज को कहीं और ले जाने की बात कही तो उन्होंने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि नेहा अपने पैरों पर चलकर अस्पताल आई थी और यहीं उसका स्वास्थ्य बिगड़ा है, इसलिए अस्पताल अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।

इसी बात को लेकर अस्पताल परिसर में विवाद बढ़ गया। सूचना मिलने पर यूपी-112, आवास विकास चौकी पुलिस और नगर कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने का प्रयास किया और स्थिति को शांत कराया।

परिजनों का आरोप है कि बाद में अस्पताल संचालक सुशील ने इलाज के खर्च का आधा हिस्सा देने का आश्वासन देकर नेहा को सफेदाबाद स्थित हिंद अस्पताल भेजने के लिए राजी किया, लेकिन बाद में अपने वादे से मुकर गए।

हिंद अस्पताल में चली जिंदगी की जंग, आखिरकार हार गई नेहा

परिजनों के अनुसार गंभीर हालत में नेहा को सफेदाबाद स्थित हिंद अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसने कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया।

परिवार के लोगों का कहना है कि नेहा लगातार दर्द से कराहती रही और उसकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। अंततः 1 जून 2026 की सुबह उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।

नेहा की मौत की खबर मिलते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अस्पताल के बाहर और गांव में मातम का माहौल छा गया। पिता राजेश कुमार यादव और अन्य परिजन बिलख-बिलख कर रोते रहे।

नेहा की NLPD हॉस्पिटल में भर्ती होने से पहले व बाद की तस्वीर

 

“बेटी चलकर गई थी, अब शव बनकर लौटी” — परिजन 

नेहा के परिजनों ने भावुक होकर कहा कि उनकी बेटी सामान्य हालत में अस्पताल गई थी। उनका आरोप है कि गलत खून चढ़ाने और गलत इलाज के कारण उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार उसकी जान चली गई।

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उन्होंने अस्पताल संचालक और इलाज कर रहे डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

फ़ोटो – 22 मई 2026 को NLPD हॉस्पिटल के बेड पर नेहा
फ़ोटो – 29 मई 2026 को NLPD हॉस्पिटल के बेड पर तड़पती नेहा

बहन शालिनी ने लगाए गंभीर आरोप

मृतका की बहन शालिनी यादव ने भी अस्पताल और डॉक्टरों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शालिनी का कहना है कि नेहा की बीमारी के विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे, फिर भी इलाज जारी रखा गया।

उनका आरोप है कि डॉक्टर जगदीश राय अस्पताल के स्थायी चिकित्सक नहीं हैं और केवल जरूरत पड़ने पर मरीज देखने आते हैं। उनके जाने के बाद मरीजों की देखभाल करने वाला कोई जिम्मेदार डॉक्टर मौजूद नहीं रहता।

शालिनी का कहना है कि यदि समय रहते विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह ली जाती और मरीज को उच्च स्तरीय केंद्र रेफर कर दिया जाता तो शायद उसकी जान बच सकती थी।

डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन के बयान में दिखा विरोधाभास

मामले में जब इलाज कर रहे डॉक्टर जगदीश राय और NLPD हॉस्पिटल के एमडी सुशील से बातचीत की गई तो दोनों के बयान अलग-अलग सामने आए।

डॉ. जगदीश राय ने स्वयं को अस्पताल का स्थायी डॉक्टर बताया, जबकि अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि वे ऑन-कॉल सेवाएं देते हैं। इसी तरह मरीज को रेफर करने को लेकर भी दोनों के बयान मेल नहीं खाते।

डॉ. राय का कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि मरीज की स्थिति में सुधार हो जाएगा, इसलिए रेफर नहीं किया गया। वहीं अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि मरीज को तीन दिन पहले ही उच्च स्तरीय अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई थी।

दोनों पक्षों के अलग-अलग बयानों ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।

स्थानीय लोगों ने भी उठाए सवाल

घटना के बाद स्थानीय लोगों में भी आक्रोश दिखाई दे रहा है। कई लोगों का कहना है कि यह पहला मौका नहीं है जब अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे हों।

कई स्थानीय लोगों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है और पूर्व में भी कई मरीजों के इलाज को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं।

इन बिंदुओं पर जांच की मांग

अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं

  • कितने बेड की अनुमति है।
  • जिस श्रेणी में अस्पताल पंजीकृत है, उसी के अनुसार सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं।
  • क्या अस्पताल के पास नवीनीकृत रजिस्ट्रेशन है।
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इलाज करने वाले डॉक्टरों की योग्यता

  • मरीज का इलाज करने वाले डॉक्टरों की डिग्री क्या है।
  • संबंधित बीमारी का इलाज करने के लिए वह डॉक्टर अधिकृत है या नहीं।
  • डॉक्टर अस्पताल का स्थायी चिकित्सक है या केवल विजिटिंग डॉक्टर।
  • डॉक्टर का नाम अस्पताल के पंजीकरण रिकॉर्ड में दर्ज है या नहीं।

ब्लड बैंक और रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया

  • नेहा को चढ़ने वाला रक्त कहां से आया।
  • Blood Group Matching हुई थी या नहीं।
  • Cross Matching Report उपलब्ध है या नहीं।
  • Transfusion Reaction होने के बाद क्या उपचार दिया गया।
  • नेहा समेत अन्य मरीजों को रक्त चढ़ाने का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है या नहीं।

मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच

  • नेहा के भर्ती होने से लेकर रेफर होने तक का पूरा रिकॉर्ड।
  • डॉक्टरों द्वारा लिखे गए प्रिस्क्रिप्शन।
  • जांच रिपोर्ट।
  • दवाओं का विवरण।
  • नर्सिंग नोट्स।
  • ICU या वार्ड रिकॉर्ड।
  • Consent Form (परिजनों की सहमति)।

रेफर करने में देरी हुई या नहीं

  • मरीज की हालत कब गंभीर हुई।
  • अस्पताल ने कब रेफर करने की सलाह दी।
  • क्या गंभीर स्थिति के बावजूद मरीज को रोककर रखा गया।

विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध थे या नहीं

  • जिस बीमारी का इलाज हो रहा था, उस विषय के विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद थे या नहीं।
  • यदि विशेषज्ञ नहीं था तो मरीज को समय पर उच्च केंद्र क्यों नहीं भेजा गया।

Clinical Establishment Norms का पालन

  • ICU की व्यवस्था।
  • ऑक्सीजन सुविधा।
  • प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ।
  • इमरजेंसी प्रबंधन की व्यवस्था।
  • आवश्यक उपकरण उपलब्ध थे या नहीं।

CCTV फुटेज और स्टाफ के बयान

  • अस्पताल के CCTV फुटेज की जांच।
  • ड्यूटी डॉक्टरों और नर्सों के बयान।
  • भर्ती और डिस्चार्ज रजिस्टर की जांच।

लोगों का कहना है कि यदि इन बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई गंभीर तथ्य और अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।

 

स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

नेहा यादव की मौत के बाद अब लोगों की नजर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई है। लोग पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच, ब्लड ट्रांसफ्यूजन प्रक्रिया की जांच, अस्पताल के रिकॉर्ड की पड़ताल और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे है।

लोगों का कहना है कि यह मामला केवल एक परिवार के दर्द तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी अस्पतालों की जवाबदेही, चिकित्सा मानकों और मरीजों की सुरक्षा को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न साबित हो सकती है।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद 

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Author: Kamran Alvi

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