बाराबंकी के रामनगर तहसील क्षेत्र का रहने वाला युवक16 वर्षों से रास्ते की मांग को लेकर संघर्ष कर रहा है।
सुनवाई न होने से नाराज़ युवक 20 मई 2026 से गन्ना संस्थान में भूख हड़ताल पर बैठा है।
पीड़ित ने प्रशासन पर उत्पीड़न, झूठे मुकदमे और अनदेखी के आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगाई है।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 23 मई 2026
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यशैली के बीच पिस रहे आम आदमी की पीड़ा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम मलौली निवासी ललित बाजपेयी पिछले करीब 16 वर्षों से अपने घर तक पहुंचने के लिए रास्ते की मांग को लेकर अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहा है, लेकिन तमाम शिकायतों, गुहारों और भूख हड़तालों के बावजूद आज तक उसकी समस्या का समाधान नहीं हो सका।
अब हालात यह हैं कि भीषण गर्मी में ललित पिछले कई दिनों से गन्ना संस्थान परिसर में भूख हड़ताल पर बैठा है। उसका आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने उसकी शिकायतों को सुनना तक जरूरी नहीं समझा और वह तपती धूप में भूख-प्यास से तड़पने को मजबूर है।

बरसात में भर जाता है कई फीट पानी, घर तक पहुंचना हो जाता है मुश्किल
रामनगर तहसील क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मलौली निवासी ललित बाजपेयी पुत्र स्वर्गीय रमेश चंद्र बाजपेयी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजे गए शिकायती पत्र में बताया कि उसके घर के रास्ते में बरसात के समय कई-कई फीट पानी भर जाता है, जिससे परिवार का घर से निकलना तक मुश्किल हो जाता है।
ललित के अनुसार उसके स्वर्गीय पिता ने भी वर्षों तक रास्ता बनवाने के लिए संघर्ष किया था। वर्ष 2010 में तत्कालीन ग्राम प्रधान द्वारा रास्ते पर मिट्टी पटाई कराई गई थी, लेकिन उसके बाद ग्राम प्रधान बदल गया और रास्ते पर खड़ंजा निर्माण का कार्य अधूरा ही रह गया।
पीड़ित का कहना है कि तब से लेकर आज तक उसने बीडीओ, एसडीएम और डीएम कार्यालय के अनगिनत चक्कर लगाए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला।

रास्ता मांगने पर मिली धमकी, पिता की हुई मौत
ललित ने आरोप लगाया कि वर्ष 2023 में जब उसने रास्ते पर खड़ंजा लगवाने की मांग उठाई, तो लेखपाल और विपक्षी पक्ष के लोगों ने उसके पिता को मकान गिराने की धमकी दी। परिवार का दावा है कि लगातार तनाव और सदमे के कारण उसके पिता की तबीयत बिगड़ी और बाद में उनकी मौत हो गई।
पीड़ित ने तत्कालीन जिलाधिकारी से भी शिकायत की, लेकिन न तो कोई जांच हुई और न ही रास्ता बन पाया।
तालाब की जमीन पर आवास, शिकायत करने पर उल्टा मुकदमा
पीड़ित युवक का आरोप है कि वर्ष 2024 में स्थानीय लेखपाल ने तालाब की जमीन पर विपक्षी पक्ष की एक महिला का प्रधानमंत्री आवास बनवा दिया। जब उसने इसकी शिकायत की तो प्रशासनिक कार्रवाई के बजाय उसके ही परिवार को निशाना बनाया गया।
ललित के मुताबिक उसके लगभग 100 वर्ष पुराने मकान को तालाब की भूमि पर बताकर उसके भाई के खिलाफ धारा 15 सी के तहत कार्रवाई कर दी गई।
पीड़ित परिवार का कहना है कि शिकायतकर्ता को ही प्रताड़ित किया गया, जबकि वास्तविक समस्या जस की तस बनी रही।

भूख हड़ताल, मारपीट और जेल… फिर भी नहीं मिला रास्ता
ललित ने बताया कि रास्ते की मांग को लेकर उसने वर्ष 2024 में गन्ना संस्थान बाराबंकी में भूख हड़ताल शुरू की थी। इसके बाद तत्कालीन एसडीएम रामनगर के हस्तक्षेप पर रास्ते की नाप हुई, जिसमें विपक्षियों का अवैध कब्जा पाया गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
आरोप है कि बाद में विपक्षी पक्ष ने तहसील कर्मचारियों की शह पर उसके साथ मारपीट की और परिवार की एक युवती के जरिए उसके खिलाफ 376 का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया, जिसके चलते उसे जेल तक जाना पड़ा।
जमानत पर बाहर आने के बाद भी कथित रूप से लगातार मानसिक उत्पीड़न जारी रहा।
तपती धूप में भूख-प्यास से तड़प रहा युवक, फिर भी नहीं पहुंचा कोई अधिकारी
पीड़ित युवक ने बताया कि 22 जनवरी 2026 को भी उसने भूख हड़ताल की थी, लेकिन अधिकारियों ने कार्रवाई के बजाय जेल भेजने की धमकी देकर उसका अनशन तुड़वा दिया।
अब 20 मई 2026 से वह दोबारा गन्ना संस्थान में भूख हड़ताल पर बैठा है। ललित का आरोप है कि 23 मई तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी उसकी सुध लेने नहीं पहुंचा।
ललित का कहना है कि वह कई दिनों से तपती धूप में भूखा-प्यासा बैठा है, लेकिन प्रशासन पूरी तरह मौन है। उसने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हस्तक्षेप कर रास्ते का निर्माण कराने और विपक्षियों के कथित उत्पीड़न से राहत दिलाने की मांग की है।

“अगर न्याय नहीं मिला तो आत्महत्या को मजबूर हो जाऊंगा”
पीड़ित युवक ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस बार भी उसकी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाएगा। उसने कहा कि ऐसी किसी भी अनहोनी के लिए प्रशासनिक अधिकारी और रास्ता रोकने वाले लोग जिम्मेदार होंगे।
प्रशासनिक संवेदनहीनता पर उठ रहे सवाल
यह मामला सिर्फ एक रास्ते का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जहां एक आम नागरिक 16 वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है, लेकिन समाधान नहीं मिलता।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने निष्पक्ष कार्रवाई की होती तो एक परिवार को इतने लंबे संघर्ष, मानसिक प्रताड़ना और भूख हड़ताल का सामना नहीं करना पड़ता।
रिपोर्ट – मंसूफ अहमद / उस्मान















