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Barabanki: सीएम योगी के आदेशों की नाफरमानी! डेढ़ माह बाद भी नहीं मिला मृत्यु प्रमाण पत्र; अधिकारियों की कार्यशैली पर उठे सवाल

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Barabanki: अधिकारियों की लापरवाही का बड़ा मामला सामने आया है, जहां सीएम योगी आदित्यनाथ के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही है।

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी बीडीओ और सचिव द्वारा डेढ़ माह बाद भी मृत्यु प्रमाण पत्र की नकल जारी नहीं की गई।

सीडीओ और सीएम पोर्टल पर शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होने से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

सीएम के सख्त निर्देशों के बावजूद जमीनी हकीकत उलट

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 03 अप्रैल 2026

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां एक ओर जन शिकायतों के समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण को लेकर लगातार सख्त रुख अपनाए हुए हैं, वहीं बाराबंकी जनपद में अधिकारी उनके आदेशों की खुलेआम अनदेखी करते नजर आ रहे हैं।

राजधानी लखनऊ से महज 30 किलोमीटर दूर स्थित इस जिले में प्रशासनिक लापरवाही इस कदर हावी है कि अधिकारियों को व्यक्तिगत दी गई शिकायतों का महीनों तक निस्तारण नहीं किया जा रहा। वही मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज अधिकतर मामलों में तो फर्जी आख्या लगाकर शिकायतों को बंद कर दिया जाता है।

डेढ़ माह बाद भी नहीं मिला मृत्यु प्रमाण पत्र

ताजा मामला नवाबगंज तहसील क्षेत्र का है, जहां वरिष्ठ पत्रकार कामरान माजिद द्वारा मृत्यु प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति के लिए 24 फरवरी 2026 को हरख ब्लॉक में आवेदन किया गया था।

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मामला चकबंदी न्यायालय में चल रहे एक वाद से जुड़ा है, जिसमें विपक्षी की वर्ष 2022 में मृत्यु हो चुकी है। आरोप है कि कुछ जालसाज़ लोगों ने अधिकारियों से साठगांठ कर मृत व्यक्ति के नाम से वर्ष 2024 में बाज़दायर प्रार्थना पत्र दाखिल कर उसे स्वीकृत भी करा लिया।

इस गड़बड़ी को उजागर करने के लिए पत्रकार को मृत्यु प्रमाण पत्र की आवश्यकता थी, लेकिन आरोप है कि जालसाजों से साठगांठ के चलते बीडीओ हरख प्रीति वर्मा और सचिव संस्कृति भटनागर द्वारा जानबूझकर इसमें बाधा डाली गई।

शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

पत्रकार द्वारा 25 फरवरी 2026 को मुख्य विकास अधिकारी अन्ना सुदन को प्रार्थना पत्र देने के साथ ही मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई गई। इसके बावजूद करीब डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी मृत्यु प्रमाण पत्र की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई है।

इस पूरे मामले में हरख ब्लॉक की सचिव संस्कृति भटनागर और बीडीओ प्रीति वर्मा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

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पत्रकार की शिकायत का यह हाल, तो आम जनता का क्या?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक पत्रकार, जो खुद जन समस्याओं को उठाता है, उसकी शिकायत का यह हाल है, तो आम जनता—खासतौर पर ग्रामीण और गरीब वर्ग—के साथ इन बेलगाम अधिकारियों का कैसा व्यवहार होता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

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प्रशासनिक दावों और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिला प्रशासन और सूचना विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्तियों में अक्सर यह दावा किया जाता है कि जिलाधिकारी शशांक त्रिपाठी जन समस्याओं के निस्तारण को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। वो स्वयं त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं और अन्य अधिकारियों को भी ऐसा करने का सख्त निर्देश देते रहते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आ रही है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या ये दावे केवल कागजी औपचारिकता और छवि निर्माण तक ही सीमित हैं?

व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

यह मामला केवल एक मृत्यु प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है—

  • क्या मुख्यमंत्री के आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं?
  • क्या स्थानीय स्तर पर अधिकारी पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं?
  • क्या शिकायत निस्तारण प्रणाली केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?
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निष्कर्ष

बाराबंकी का यह मामला साफ तौर पर दर्शाता है कि शासन स्तर पर सख्ती के बावजूद निचले स्तर पर लापरवाही और मनमानी जारी है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे आम जनता का भरोसा शासन-प्रशासन से पूरी तरह उठ सकता है। सत्तारूढ़ पार्टी को जिसका खामियाजा 2027 के विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद

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Author: Kamran Alvi

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