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Barabanki: 18 साल पुराने गोवध-गैंगस्टर केस में कोर्ट का अहम फैसला, सबूतों के अभाव में तीनों आरोपी दोषमुक्त; अदालत ने कहा- “मुकदमा दर्ज होना अपराध साबित होने के लिए काफी नहीं”

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Barabanki News: बाराबंकी में 2007 के गोवध, पशु क्रूरता और गैंगस्टर एक्ट के 18 साल पुराने मुकदमे में अदालत ने सिराज, चुन्ना और अजीज को ठोस सबूतों के अभाव में सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 01 सितंबर 2026

बाराबंकी में करीब 18 साल तक अदालत की चौखट पर चले गोवध निवारण अधिनियम, पशु क्रूरता अधिनियम और यूपी गैंगस्टर एक्ट से जुड़े मुकदमे में आखिरकार फैसला आ गया। विशेष न्यायालय यू.पी. गैंगस्टर एक्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी प्रावधानों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद तीन जीवित आरोपियों को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के जरिए साबित नहीं कर सका। खास तौर पर गैंगस्टर एक्ट के आरोपों को लेकर अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह किसी संगठित गिरोह का सदस्य है।

18 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद आए इस फैसले से मामले में लगाए गए गोवध निवारण अधिनियम, पशु क्रूरता अधिनियम और गैंगस्टर एक्ट के आरोपों पर न्यायिक प्रक्रिया का पटाक्षेप हो गया।

क्या है 2007 का पूरा मामला?

मामला वर्ष 2007 में थाना कोठी क्षेत्र से जुड़ा है। ग्राम सरायमीर निवासी राम गोपाल की तहरीर के आधार पर पुलिस ने गोवध निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

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पुलिस की विवेचना के अनुसार, छह लोगों पर आरोप लगाया गया था कि वे एक सफेद गाय को कथित तौर पर काटकर उसका मांस बेचने की नीयत से ले जा रहे थे।

विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस ने इलियास पुत्र जान मोहम्मद, नसीम पुत्र फकीर मोहम्मद, सिराज पुत्र अली बख्श, चुन्ना पुत्र रज्जाक कसाई, लल्लन पुत्र घसीटे कसाई और अजीज पुत्र यासीन कसाई, सभी निवासी ग्राम मीरापुर, थाना कोठी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।

बाद में इसी मामले को आधार बनाकर आरोपियों के खिलाफ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई।

फैसला आने से पहले तीन आरोपियों की हो चुकी थी मौत

मुकदमे की सुनवाई करीब 18 साल तक चली। इस दौरान मामले के तीन आरोपियों इलियास, नसीम और लल्लन की मृत्यु हो गई।

आरोपियों की मौत के बाद उनके खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही समाप्त कर दी गई। इसके बाद मुकदमे में तीन जीवित आरोपी सिराज, चुन्ना और अजीज रह गए, जिनके खिलाफ अदालत में सुनवाई जारी रही।

अदालत ने कहा- मुकदमा दर्ज होना गैंगस्टर एक्ट का अपराध साबित नहीं करता

विशेष न्यायाधीश विनय आर्या (एचजेएस) की अदालत ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहों का परीक्षण किया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने गैंगस्टर एक्ट के आरोप को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने साफ किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होना मात्र इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह गैंगस्टर एक्ट के तहत अपराधी है।

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अभियोजन को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी किसी संगठित गिरोह का सदस्य है और उसके आपराधिक कृत्यों से समाज में भय अथवा दहशत पैदा हुई तथा उसने गैरकानूनी तरीके से आर्थिक लाभ या संपत्ति हासिल की।

अदालत के मुताबिक इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ इन आवश्यक तथ्यों को पर्याप्त साक्ष्यों के साथ साबित करने में सफल नहीं रहा।

स्वतंत्र गवाह की गवाही भी नहीं करा सका अभियोजन

अदालत ने मामले में स्वतंत्र गवाहों की कमी को भी महत्वपूर्ण माना। फैसले में कहा गया कि विवेचना के दौरान किसी स्वतंत्र गवाह को परीक्षित नहीं कराया गया। ऐसे में अभियोजन की कहानी को मजबूत करने वाली स्वतंत्र और विश्वसनीय गवाही अदालत के सामने नहीं आ सकी।

अदालत ने न्यायिक नजीरों का हवाला देते हुए यह भी माना कि केवल किसी व्यक्ति को गिरोह का सदस्य बता देना पर्याप्त नहीं है। आरोप साबित करने के लिए उसकी सक्रिय संलिप्तता और ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं।

18 साल बाद सिराज, चुन्ना और अजीज को मिली राहत

एक सितंबर को विशेष न्यायालय यू.पी. गैंगस्टर एक्ट ने अपना फैसला सुनाया। अदालत ने सिराज, चुन्ना और अजीज को गोवध निवारण अधिनियम, पशु क्रूरता अधिनियम और यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत लगाए गए सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

अदालत ने उनके जमानत बंधपत्र निरस्त करते हुए उन्हें सभी दायित्वों से मुक्त करने का आदेश दिया। इस तरह वर्ष 2007 में शुरू हुआ यह मुकदमा करीब 18 साल बाद तीनों जीवित आरोपियों के बरी होने के साथ समाप्त हो गया।

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बचाव पक्ष के अधिवक्ता बोले- आरोप लगाना और साबित करना अलग-अलग बात

आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता मुहम्मद उमर मुख्तार ने फैसले को न्याय की जीत बताया।

उन्होंने कहा कि 18 साल पुराने इस मुकदमे का फैसला एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है कि किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगना अलग बात है और उन आरोपों को अदालत में पुख्ता साक्ष्यों से साबित करना अलग बात।

अधिवक्ता के मुताबिक अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की कसौटी पर अभियोजन की कहानी को परखा और पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।

रिपोर्ट – मंसूफ अहमद 

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Author: Kamran Alvi

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