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Barabanki: मजबूरी या हौसला? रोज़गार के लिए जनपद के 36 युवाओं ने युद्ध के साये में इज़राइल जाने का लिया फैसला

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Barabanki: ज़िले के 36 युवाओं ने बेरोजगारी और महंगाई से जूझते हुए इज़राइल-ईरान तनाव के बीच इज़राइल जाने का फैसला किया।

परिवार की जिम्मेदारी ने उन्हें जोखिम उठाने पर मजबूर किया।

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बाराबंकी, उत्तर प्रदेश | 23 मार्च 2026

कहते हैं कि जब पेट और परिवार की जिम्मेदारी सामने होती है, तो इंसान हर डर को पीछे छोड़ देता है। कुछ ऐसा ही दृश्य बाराबंकी में देखने को मिला, जहां 36 युवाओं ने युद्ध जैसे हालातों के बीच इज़राइल जाने का साहसिक निर्णय लिया है।

बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से परेशान ये युवा अब अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाने को तैयार हैं।

Barabanki: मजबूरी या हौसला? रोज़गार के लिए जनपद के 36 युवाओं ने युद्ध के साये में इज़राइल जाने का लिया फैसला

देवा और रामनगर समेत कई इलाकों से चुने गए युवा

जनपद के देवा, रामनगर और आसपास के क्षेत्रों से चयनित इन 36 युवाओं का जिला अस्पताल में मेडिकल परीक्षण पूरा हो चुका है। अब उनकी दस्तावेजी प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

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इन युवाओं की आंखों में डर जरूर है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा अपने परिवार को संभालने की जिम्मेदारी का बोझ साफ दिखाई देता है।

 

‘डर तो लगता है, लेकिन कमाना भी जरूरी है’

युवाओं ने बातचीत में बताया कि इज़राइल-ईरान तनाव और युद्ध जैसी खबरें उन्हें डराती जरूर हैं, लेकिन घर की हालत उन्हें रुकने नहीं देती।

उनका कहना है कि

“डर तो है, लेकिन परिवार के लिए कमाना भी जरूरी है। अगर हम नहीं जाएंगे तो घर कैसे चलेगा?”

यही सोच उन्हें हर खतरे से लड़ने की ताकत दे रही है।

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बेहतर भविष्य की उम्मीद, सुरक्षा पर भरोसा

युवाओं को उम्मीद है कि इज़राइल में उन्हें बेहतर रोजगार के अवसर मिलेंगे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। साथ ही उन्हें वहां की सरकार और व्यवस्था पर भी भरोसा है कि उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

हौसले की कहानी या मजबूरी की दास्तान?

युद्ध जैसे हालातों में भी रोजी-रोटी के लिए लिया गया यह फैसला सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की कहानी है जो बेहतर भविष्य के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार हैं।

यह कहानी हौसले की भी है… और मजबूरी की भी।

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रिपोर्ट – मंसूफ अहमद / उस्मान

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Author: Kamran Alvi

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